कांग्रेस ने बलिदान दिवस पर शहीद मंगल पांडे और विंकम चंद्र चट्टोपाध्याय को याद किया

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बदायूं।आज जिला कांग्रेस कमेटी कार्यालय पर देश के अमर शहीद मंगल पांडे और वंदे मातरम के रचयिता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विंकम चंद्र चट्टोपाध्याय की पुण्यतिथि पर जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष ओंकार सिंह के नेतृत्व में पुष्पांजलि अर्पित की गई एवं बलिदान दिवस मनाते हुए एक गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर में पर कांग्रेस जनों ने वंदे मातरम का भी गायन किया। गोष्ठी की अध्यक्षता जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष ओंकार सिंह ने की और श्री जितेंद्र कश्यप प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव मुख्य अतिथि के रूप में कार्यक्रम में शामिल रहे। गोष्ठी में मुख्य अतिथि जितेन्द्र कश्यप जी ने उपस्थित कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि साल 1905 में ब्रिटिश सरकार के बंगाल के विभाजन के फैसले से लोग काफ़ी गुस्से में थे.. यही वो समय था जब स्वतंत्रता सेनानियों के बीच एक गीत उभरकर आया और बन गया हर भारतीय की आवाज़। वह अमर गीत था- वन्दे मातरम्! बंकिम चन्द्र चटोपाध्याय की कलम से निकले इस खास गाने के बोल आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम की पहचान बन गए। लेकिन आख़िर कौन थे बंकिम चन्द्र? बंगाल के मेदिनीपुर में जन्में बंकिम बचपन से ही पढ़ने में बहुत अच्छे थे। कलकत्ता के प्रसिद्ध प्रेसीडेंसी कॉलेज से ग्रेजुएशन की डिग्री लेने के बाद कानून की पढ़ाई कर वह एक सरकारी अधिकारी बने। इसी दौरान उन्हें भारत का शोषण करने वाली अंग्रेज़ी नीतियों के बारे में पता चला। किसी भी सच्चे देशभक्त की तरह ही उनमें राष्ट्रीयता की भावना जग उठी और उनका झुकाव लेखन की तरफ बढ़ने लगा। 1872 में उन्होंने बंगदर्शन नामक पत्रिका निकाली जिससे वह राष्ट्रीयता को फैलाने की कोशिश करने लगे। बंगदर्शन के शुरू होने के एक दशक बाद, साल 1882 में बंकिम ने एक ऐसे उपन्यास की कल्पना की, जो देश में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध लोगों को जागरूक करे। यह उपन्यास था ‘आनंदमठ’। इसे उस समय में लिखा गया जब बंगाल ने लगातार तीन अकाल झेले थे। यह तीन ऐसे भिक्षुओं की कहानी बयान करता है, जिन्होंने 1770 की शुरूआत में ‘सन्यासी विद्रोह’ के दौरान ब्रिटिश राज के खिलाफ़ लड़ाई लड़ी थी। ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा प्रतिबंधित इस उपन्यास में पहली बार एक कविता के रूप में ‘वन्दे मातरम्’ प्रकाशित हुआ था। रबीन्द्रनाथ टैगोर ने इस गीत को एक धुन में पिरोया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साल 1896 के सत्र में पहली बार सार्वजनिक स्थल पर इसे गाया। साल 1905 में बंगाल विभाजन के दौरान, यह कांग्रेस का नारा बन गया और जल्द ही भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक भी! आज बंकिम चन्द्र चटोपाध्याय की पुण्यतिथि पर उनकी महान शख्सियत और कार्यों को याद करते हुए हम उन्हें नमन करते हैं। गोष्ठी को संबोधित करते हुए जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष ओंकार सिंह ने कहा देश के अमर शहीद श्री मंगल पांडे 9 जुलाई 1857 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नंगवा ग्राम में ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे, मंगल पांडे एक भारतीय सेनानी थे जिन्होंने 1857 भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी वह ईस्ट इंडिया कंपनी की 34 वी बंगाल रेजिमेंट के सिपाही थे तत्कालीन अंग्रेजी शासन में उन्हें बागी करार दिया जबकि आम हिंदुस्तानी ने उन्हें आजादी की लड़ाई के नायक के रूप में सम्मान देती है। भारत सरकार द्वारा उनके सम्मान में 1984 में डाक टिकट जारी किया ।मंगल पांडे द्वारा गाय की चर्बी वाले कारतूस को दांत से काटने से मना करने पर उन्हें 8 अप्रैल 18 57 में उनको फांसी दे दी गई ।आज उनकी पुण्यतिथि पर हम सभी उनको सादर नमन करते हैं। इस अवसर पर जिला कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष वीरेश तोमर जी, जिला कांग्रेस कमेटी के महासचिव डॉ राम रतन पटेल, किसान यूनियन के पूर्व अध्यक्ष सर्वेश पटेल ,जिला युवक कांग्रेस के सचिव वीरेश यादव जी, राम प्रताप सिंह सचिव जिला कांग्रेस कमेटी, बख्तियार उद्दीन, शीशपाल सिंह, रामपाल सिंह राजेंद्र ,शोएब अहमद , साकिर अली आदि कार्यकर्ता पदाधिकारी उपस्थित रहे।

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