अक्षय फल प्रदायिनी अक्षय तृतीया
दिल्ली।पौराणिक मान्यताओं के आधार पर वैशाख मास शुक्ल पक्ष तृतीया को अक्षय तृतीया की संज्ञा दी गयी है। इसी दिन भगवान विष्णु के छठे अवतार श्री परशुराम का जन्म वैशाख शुक्ल तृतीया पुनर्वसु नक्षत्र में रात्री के प्रथम प्रहर में ऋषि जमदग्नि व माता रेणुका के पुत्र रुप में हुआ था । जन्म के समय छ: ग्रह अपनी उच्च राशि में विद्यमान थे ।
वैशाखस्यासितेपक्षे तृतीयांपुनर्वसौ ।
निशाया: प्रथमेयामेरामाख्यसमयेहरि: ।।
आचार्य सन्तोष कुमार शब्देन्दु ने बताया कि बाल्यकाल में भगवान परशुराम का नाम राम था किन्तु भगवान शिव की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने अपना परशु इन्हें प्रदान किया ,पश्चात् भगवान परशुराम कहलाये । इन्होने इक्कीस बार सम्पूर्ण पृथ्वी को आततायी दुष्टों से विहीन कर पृथ्वी पर सुख शान्ति धर्म की पुन:स्थपना की थी । भगवान परशुराम के विषय में मान्यता है कि आज भी भगवान चिरंजीव अजर अमर है, और भक्तों के मनोरथों को पूर्ण करने बाले हैं । इस दिन ही सतयुग समाप्त होकर त्रेतायुग का प्रारम्भ हुआ था, इसलिए इस तिथि को युगादि तिथी भी कहते हैं ।
ज्योतिष के अनुसार अक्षय तृतीया को परम मंगलमयी तथा स्वयं सिद्ध माना गया है, इस दिन व्यापार का प्रारम्भ करने पर उत्तरोत्तर वृद्धि होती है ।भूमि, सुवर्ण,चांदी ,वाहन आदि का खरीदना शुभ माना गया है । महालक्ष्मी की पूजा अर्चना करने से अक्षय काल तक सुख ,समृद्धि ,धन,ऐश्वर्य की वृद्धि अक्षय पर्यन्त बनी रहती है ।
मत्स्यपुराण तथा पद्मपुराण के अनुसार इस तिथी पर पितरों का श्राद्ध करने पर पितरों को विशेष तृप्ति मिलती हैं, और पितर प्रसन्न होते हैं ।
भविष्यपुराण का वचन है कि अक्षय तृतीया को गंगा स्नान करने से सब पाप नष्ट हो जाते हैं । इस दिन मनुष्यों को जौं से भगवान विष्णु का पूजन और हवन करना चाहिए । तथा ब्राह्मणों को जौं का दान करना चाहिए । स्वयं भी जौं का आहार करना चाहिए । जल से भरा घड़ा ,सुवर्ण ,अन्न, सम्पूर्ण रस ,जौं,चना,सत्तू ,दही और भात इन सबका दान श्रेष्ठ बताया गया है ।
देवीपुराण के अनुसार जलपूरित घट दान करने से शिवकृपा प्राप्त होती है । इस दिन दिया गया दान अक्षय पुण्य को प्रदान करता है ।














































































