उझानी में सड़क बनी खलिहान: अफसर बेखबर, हर दिन घायल हो रहे राहगीरबिल्सी-उझानी सड़क या हादसों का अड्डा

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उझानी/बदायूं, उझानी-बिल्सी मार्ग की पहचान अब सड़क से ज्यादा किसानों के ‘प्राइवेट खलिहान’ के रूप में हो रही है। सड़क पर फैले मक्के के दानों पर रोज बाइक सवार फिसलकर चोटिल हो रहे हैं। बड़े वाहन भी अनियंत्रित होकर दुर्घटना का शिकार बन रहे हैं, मगर तंत्र ने आंखें मूंद रखी हैं।

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‘मजबूरी’ के नाम पर सड़क पर कब्जा
किसान रामेश्वर खुद स्वीकारते हैं— “खेत-खलिहान में जगह नहीं बची, इसलिए सड़क पर मक्का सुखाना पड़ रहा है। हां, हादसे का डर तो है।” चौंकाने वाली बात यह है कि शहर में शुल्क देकर मक्का सुखाने के लिए निजी फड़ उपलब्ध हैं, फिर भी मुफ्त की सड़क पर कब्जा जमाया जा रहा है। टोकने-रोकने वाला कोई नहीं।

“हर दिन जान हथेली पर रख स्कूल जाती हूं”
संजरपुर की शिक्षिका रेखा सक्सेना और रोली के शिक्षक रामसिंह यादव का दर्द साफ झलकता है। “रोज स्कूटी से स्कूल जाना किसी जंग से कम नहीं। हम कितनी भी सावधानी बरतें, सामने वाला फिसलकर टकरा सकता है। बारिश में भीगी मक्का तो और जानलेवा हो जाती है।” जब शिक्षकों को ही स्कूल जाने में डर लगे, तो आम राहगीर की हालत समझी जा सकती है।

जिम्मेदारों का बयान: “हमारा काम नहीं”
सबसे हैरान करने वाला जवाब एआरटीओ हरिओम कुमार का है। कैमरे पर दो टूक कहा— “यह कार्यक्षेत्र हमारे विभाग के अधीन नहीं आता।” पुलिस, प्रशासन और पीडब्ल्यूडी भी मौन साधे हैं। हादसों में लोग लगातार अस्पताल पहुंच रहे हैं, पर सड़क पर एक भी अफसर कार्रवाई को नहीं उतरा।

पड़ताल में खुली पोल
इस मार्ग पर मक्के की वजह से कई लोग गंभीर रूप से घायल हो चुके हैं। किसी की हड्डी टूटी तो कोई महीनों बिस्तर पर पड़ा रहा। इसके बावजूद न बैरिकेड लगे, न चालान कटा और न ही कोई सख्ती दिखी।

राहगीरों का फूटा गुस्सा
स्थानीय निवासी दामोदर सिंह कहते हैं— “अगले दो-तीन महीने इस सड़क से गुजरना जान जोखिम में डालने जैसा है।” वहीं कन्हैया वार्ष्णेय का कहना है— “प्रशासन के भरोसे रहे तो घर बैठना पड़ेगा। अपनी सुरक्षा अब खुद ही करनी होगी।”
सवाल अब भी जस का तस
जब निजी फड़ खाली हैं, वैकल्पिक इंतजाम मौजूद है, तो सड़क पर मक्का क्यों? जवाब सीधा है— क्योंकि रोकने वाला कोई नहीं। कार्रवाई के नाम पर विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं। बड़ा सवाल: आखिर कब तक घायलों की गिनती बढ़ती रहेगी !

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