आधुनिक तकनीकों से गन्ना खेती में सफलता की नई इबारत लिख रहे कृषक प्रदीप सिंह
बदायूं। उत्तर प्रदेश के बदायूं जनपद के विकासखंड उझानी क्षेत्र के ग्राम गठौना निवासी कृषक प्रदीप सिंह ने आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाकर गन्ना खेती में सफलता की नई मिसाल कायम की है। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि यदि खेती को वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नई तकनीकों के साथ किया जाए, तो कृषि न केवल लाभकारी व्यवसाय बन सकती है बल्कि युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बन सकती है। खेती में ज्ञान ही सबसे बड़ी पूंजी है। अगर हम विज्ञान को हल के साथ जोड़ दें, तो किसान कभी कर्जदार नहीं रहेगा।
प्रदीप सिंह ने मास्टर ऑफ एग्रीकल्चर (एम.एससी. एग्रीकल्चर) की शिक्षा प्राप्त करने के बाद पारंपरिक नौकरी की राह चुनने के बजाय अपने पुश्तैनी खेतों में आधुनिक खेती को अपनाने का निर्णय लिया। उन्होंने देखा कि पारंपरिक तरीके से गन्ना उगाने वाले किसानों को लागत अधिक और लाभ कम मिल रहा है। मिट्टी की उर्वरता कम होती जा रही थी तथा जल स्तर भी लगातार नीचे जा रहा था। इन चुनौतियों को अवसर में बदलते हुए उन्होंने आधुनिक तकनीकों पर आधारित स्मार्ट फार्मिंग की शुरुआत की।
उन्होंने गन्ना खेती में ट्रेंच विधि को अपनाया, जिसमें गहरी नालियां बनाकर गन्ने की बुवाई की जाती है। इस तकनीक से पौधों की जड़ें गहराई तक फैलती हैं, गन्ना अधिक मजबूत होता है तथा तेज हवाओं में फसल गिरने की संभावना कम हो जाती है। साथ ही पौधों के बीच पर्याप्त दूरी रहने से धूप और हवा का संचार बेहतर होता है, जिससे उत्पादन क्षमता बढ़ती है।
जल संरक्षण की दिशा में भी प्रदीप सिंह ने सराहनीय कार्य किया है। उन्होंने अपने खेतों में ड्रिप सिंचाई प्रणाली स्थापित की, जिससे पानी की खपत में लगभग 50 से 60 प्रतिशत तक कमी आई। इस तकनीक से पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है, जिससे फसल को आवश्यक नमी मिलती है और खरपतवार भी कम उगते हैं।
इसके अतिरिक्त उन्होंने सह-फसली खेती को भी बढ़ावा दिया। गन्ने की दो कतारों के बीच खाली स्थान में वे आलू, सरसों, धनिया, मटर एवं सौंफ जैसी फसलें उगाते हैं। इससे गन्ने की मुख्य फसल तैयार होने से पहले ही अतिरिक्त आय प्राप्त हो जाती है और किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।
प्रदीप सिंह ने जैविक खेती की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। उन्होंने खेतों में जीवामृत, घनजीवामृत तथा वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग शुरू किया। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के स्थान पर नीम आधारित जैविक उत्पादों का प्रयोग कर उन्होंने खेती की लागत को कम किया तथा गन्ने की गुणवत्ता और मिठास में भी वृद्धि की।
प्रारंभिक दौर में गांव के कई लोगों ने उनकी तकनीकों पर संदेह व्यक्त किया, लेकिन जब उनकी फसल का उत्पादन सामान्य किसानों की तुलना में लगभग दोगुना हुआ, तब सभी ने उनकी मेहनत और सोच की सराहना की। जहां सामान्यतः एक एकड़ में 250 से 300 क्विंटल उत्पादन प्राप्त होता था, वहीं प्रदीप सिंह ने 500 से 600 क्विंटल प्रति एकड़ तक उत्पादन हासिल किया।
आज प्रदीप सिंह केवल एक सफल किसान ही नहीं, बल्कि क्षेत्र के अन्य किसानों और युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। वे किसानों को आधुनिक तकनीकों, जैविक खेती और जल संरक्षण के प्रति जागरूक कर रहे हैं। उनका मानना है कि यदि विज्ञान और पारंपरिक कृषि अनुभव का सही समन्वय किया जाए, तो खेती को अत्यंत लाभकारी बनाया जा सकता है।















































































