धृतराष्ट्र को देख कर गांधारी ने अपनी बांधी आंखों पर पट्टी

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बरेली। एसआरएमएस रिद्धमा के प्रेक्षागृह में रविवार को शंकर शेष लिखित और विनायक श्रीवास्तव द्वारा निर्देशित नाटक ‘कोमल गांधार’ का मंचन हुआ। महाभारत की पृष्ठभूमि पर आधारित इस नाटक में गांधारी के चरित्र को एक नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया। जहां परंपरागत कथाओं में गांधारी को केवल एक आदर्श पत्नी और माता के रूप में दिखाया गया है, वहीं नाटक ‘कोमल गांधार’ उनके अंतर्मन, उनकी पीड़ा, उनके संघर्ष और उनकी वैचारिक शक्ति को केंद्र में लाता है। नाटक में गांधारी के माध्यम से व्यक्तिगत त्रासदी, बल्कि सामाजिक और नैतिक प्रश्नों को भी प्रभावशाली ढंग से उठाया गया। यह प्रस्तुति दर्शकों को स्त्री-अस्मिता, त्याग, सत्ता और धर्म के जटिल संबंधों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है। नाटक का आरंभ भीष्म द्वारा संजय के साथ गांधारी को धृतराष्ट्र से विवाह के लिए गांधार से हस्तिनापुर लेकर लाने से होता है। साथ में शकुनि भी आता है। गांधारी को पता नहीं है कि धृतराष्ट्र अन्धा है। यह जानकारी होने के बाद भी गांधारी धृतराष्ट्र से विवाह कर लेती हैं। वह विवाह मंडप में इस दुनिया को नहीं देखने की प्रतिज्ञा के साथ अपनी आँखों पर पट्टी बांध लेती हैं। धृतराष्ट्र इससे सहमत नहीं होते और गांधारी से पट्टी खोलने के लिए कहते हैं, लेकिन वो मन से दुखी और प्रतिशोध के कारण पट्टी खोलने से मना कर देती है। जिससे धृतराष्ट्र नाराज होकर कमरे बाहर चला जाता है। वह दुखी और नाराज होकर भीष्म से कहता आपने मेरे अंधे होने की जानकारी गांधारी को न देकर ठीक नहीं किया, मेरे और गांधारी के बीच कोई भी भावात्मक सम्बन्ध नहीं हैं| भीष्म यह सुन बहुत दुखी होता है और संजय से कहता है ये भविष्य के लिए ठीक नहीं है। क्योंकि धृतराष्ट्र के किसी दासी से सम्बन्ध है उसे डर है कि दासी से उत्पन्न पुत्र आगे चल कर सत्ता पर दावा न कर दे। अगले दृश्य में शकुनि धृतराष्ट्र को समझाता है कि वो उसकी बहन गांधारी से मिले और उत्तराधिकारी की बात करे। क्योंकि पाण्डु का पुत्र हो गया तो भीष्म उसी को सत्ता सौंप देंगे। तब धृतराष्ट्र गांधारी से मिलने जाता है और उत्तराधिकारी की बात कहता है, गांधारी कहती है कि उसने मना तो नहीं किया और उसे ताने मरती है इतनी धन दौलत से ख़रीदे हुए शरीर का कुछ तो उपयोग होना चाहिए। कुछ समय बाद दुर्योधन पैदा होता है। धृतराष्ट्र बहुत प्रसन्न होता है। समयांतराल के बाद गांधारी धृतराष्ट्र से कहती है कि वो दुर्योधन को समझाएं की वो पांडवों को पांच गांव दे दे, लेकिन दुर्योधन मना कर देता है और महाभारत के युद्ध में भीम से पराजित हो जाता है। मरणासन्न एक सरोवर के किनारे घायल अवस्था में पड़े दुर्योधन से मिलने संजय के साथ गांधारी और धृतराष्ट्र जाते हैं। दुर्योधन गांधारी को उलाहना देता है। कि उसने हम भाइयों के सिर पर कभी ममता का हाथ नहीं फेरा, हम सब तेरे प्यार से अछूते रहे, क्योकि तेरे मन में तो इस वंश के प्रति क्रोध था। पांडवों के युद्ध जितने के बाद गांधारी और धृतराष्ट्र महल छोड़ कर जंगल में जाने का निर्णय लेते हैं। जंगल में धृतराष्ट्र गांधारी से आंखों पर बंधी पट्टी फिर से खोलने को कहता है। गांधारी पट्टी खोल देती है। धृतराष्ट्र उसे जंगल का वर्णन करने को कहता है। और पूछता है की जंगल में कहीं आग लगी है क्या ? दोनों धीरे धीरे उस आग में चले जाते है। नाटक यहीं पर समाप्त हो जाता है। नाटक में गांधारी की भूमिका अनमोल मिश्रा और धृतराष्ट्र की भूमिका पंकज कुकरेती ने निभाई। विनायक श्रीवास्तव (भीष्म), मानेश यादव (संजय), शिवम् यादव (शकुनि), विषा गंगवार (दासी), गौरव कार्की (दुर्योधन) ने भी अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया। आयुष, तन्मय, श्रीजेश, शिवम् ने सिपाहियों का रोल किया। नाटक में इंस्ट्रूमेंट गुरुओं सूर्यकान्त चौधरी (वायलिन), ऋषभ आशीष पाठक (पखावज), डैरिक (कीबोर्ड), विशेष सिंह (गिटार) ने अपने वाद्ययंत्रों के माध्यम से और गायन गुरु सात्विक मिश्रा और प्रियंका ग्वाल ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। रिकॉर्डेड संगीत गौरव कार्की ने दिया जबकि साउंड अरुण सैनी, ज़ाफर और प्रकाश संयोजन की जिम्मेदारी जसवंत सिंह ने उठाई। इस अवसर पर एसआरएमएस ट्रस्ट के संस्थापक व चेयरमैन देव मूर्ति , आशा मूर्ति , ऋचा मूर्ति , देविशा मूर्ति , उषा गुप्ता , इंजीनियर सुभाष मेहरा, डा.प्रभाकर गुप्ता, डा.अनुज कुमार, डा.शैलेश सक्सेना, डा.आशीष कुमार, डा.रीता शर्मा और गण्यमान्य लोग मौजूद रहे।

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