अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में डॉ. प्रिया सक्सेना का व्याख्यान, भारतीय ज्ञान परंपरा पर रखा शोधपूर्ण दृष्टिकोण

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बरेली। महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति की प्रेरणा से प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति विभाग की डॉ. प्रिया सक्सेना ने अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “भारतीय ज्ञान परंपरा: विविध आयाम” में विशेषज्ञ के रूप में महत्वपूर्ण व्याख्यान दिया। यह सम्मेलन बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग द्वारा आयोजित किया गया।

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डॉ. प्रिया सक्सेना ने 21 मार्च को “भारतीय ज्ञान प्रणाली के माध्यम से कलात्मक परंपरा की पुनर्व्याख्या” विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। अपने संबोधन में उन्होंने भारतीय शिल्प परंपरा और ज्ञान परंपरा के गहरे संबंधों को विस्तार से बताया। उन्होंने बताया कि वैदिक काल से ही शिल्प और कला, वैदिक साहित्य तथा गुरुकुल शिक्षा पद्धति का अभिन्न अंग रहे हैं, जिनके पुष्टि साक्ष्यों से भी होती है।
उन्होंने ऋग्वेद में शिल्प देव ‘त्वस्तर’ और ‘विश्वकर्मा’ की परंपरा का उल्लेख करते हुए बताया कि प्राचीन भारतीय शिल्प परंपराओं को आधुनिक संदर्भों के साथ समन्वित किया जा सकता है। मृदभांड, मुक्तामणि, टेराकोटा मूर्तियां तथा लौह-ताम्र खनिजों से बने शस्त्र जैसे शिल्प कार्यों को मानव की पारंपरिक विरासत समझाए हुए उनके संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।
सम्मेलन के संचालक प्रो. गंगाधरण और सह-आयोजक डॉ. राम प्रकाश शर्मा ने डॉ. सक्सेना के व्याख्यानों की सराहना करते हुए उन्हें बधाई दी। समापन सत्र में आरा विश्वविद्यालय के उपाध्यक्ष प्रो. शैलेन्द्र चतुर्वेदी, प्रो. रजनीश शुक्ल तथा भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद के सदस्य सचिव ओम जी उपाध्याय ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भारतीय संस्कृति और परंपरा के विविध पहलुओं को उजागर करते हुए अपने उद्देश्यों में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

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