“मिट्टी से मानक तक: भारत के BIS ‘गवर्निंग-काउंसिल’ में शामिल हुए डॉक्टर राजाराम त्रिपाठी
दिल्ली। भारत सरकार द्वारा असाधारण राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना के माध्यम से प्रख्यात जैविक कृषक, पर्यावरण चिंतक और किसान नेता डॉ. राजाराम त्रिपाठी को भारतीय मानक ब्यूरो (Bureau of Indian Standards – BIS) की गवर्निंग काउंसिल का सदस्य नामित किया गया है। यह नियुक्ति देश की सर्वोच्च मानक निर्धारण संस्था में किसान और जैविक कृषि क्षेत्र की प्रभावी भागीदारी का प्रतीक मानी जा रही है।

जैविक खेती एवं औषधीय पौध क्षेत्र में उनकी गहन विशेषज्ञता को देखते हुए भारत सरकार ने पूर्व में ही उन्हें आयुष मंत्रालय के अंतर्गत नेशनल मेडिसिनल प्लांट बोर्ड का सदस्य नियुक्त किया था। इस दायित्व के अंतर्गत वे देश में औषधीय पौधों के संरक्षण, उत्पादन, गुणवत्ता मानकीकरण और किसानों की आय वृद्धि से जुड़े राष्ट्रीय निर्णयों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
डॉ. राजाराम त्रिपाठी का जीवन बस्तर की मिट्टी से गहराई से जुड़ा रहा है। उन्होंने वर्षों तक आदिवासी अंचलों में रहकर जैविक खेती, औषधीय पौध उत्पादन, वन आधारित आजीविका, महिला स्व-सहायता समूहों और मूल्य संवर्धन आधारित मॉडल विकसित किए, जिससे हजारों आदिवासी परिवारों को स्थायी रोजगार और सम्मानजनक आय प्राप्त हुई। जैविक और प्राकृतिक खेती के क्षेत्र में उनके नवाचारों ने यह सिद्ध किया है कि पर्यावरण संरक्षण और किसान की आय वृद्धि एक-दूसरे के पूरक हैं। वृक्ष आधारित प्राकृतिक ग्रीनहाउस, कम लागत कृषि संरचनाएं, उच्च उत्पादक फसल किस्में और हर्बल आधारित खेती मॉडल आज देश के अनेक राज्यों में किसानों द्वारा अपनाए जा रहे हैं। किसान संगठनों के माध्यम से भी उनका योगदान राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावशाली रहा है। अखिल भारतीय किसान महासंघ के राष्ट्रीय संयोजक के रूप में उन्होंने जीएम फसलों, विदेशी कृषि आयात, बीज संप्रभुता, भूमि अधिकार और जैव विविधता संरक्षण जैसे विषयों पर किसानों की आवाज को मजबूती से नीति मंच तक पहुंचाया। डॉ. त्रिपाठी देश के सर्वाधिक शिक्षित किसानों में गिने जाते हैं। परंपरागत चिकित्सा पर पीएचडी सहित छह विषयों में स्नातकोत्तर शिक्षा, अनेक पुस्तकों का लेखन और राष्ट्रीय समाचार पत्रों में नियमित स्तंभ लेखन उनकी बहुआयामी पहचान को दर्शाता है। अब तक वे 40 से अधिक देशों की यात्रा कर वैश्विक कृषि प्रणालियों, जैविक मानकों और किसान सुरक्षा नीतियों का प्रत्यक्ष अध्ययन कर चुके हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि BIS गवर्निंग काउंसिल और नेशनल मेडिसिनल प्लांट बोर्ड दोनों मंचों पर उनकी उपस्थिति से कृषि उत्पादों, जैविक मानकों, हर्बल उद्योग और ग्रामीण नवाचारों से जुड़े निर्णय अधिक व्यावहारिक, किसान हितैषी और पर्यावरण अनुकूल बनेंगे। इस राष्ट्रीय दायित्व के माध्यम से छत्तीसगढ़ और विशेष रूप से बस्तर अंचल की पहचान देश के नीति निर्माण मंच तक पहुंची है, जिससे क्षेत्र के किसानों, आदिवासी समाज और जैविक उत्पादों को प्रत्यक्ष लाभ मिलने की संभावना बनेगी यह नियुक्ति इस बात का संकेत है कि अब भारत की नीति प्रक्रिया में केवल महानगर नहीं, बल्कि गांव, खेत और जंगल की आवाज भी निर्णायक भूमिका निभा रही है।













































































