सुपंथी स्मृति स्थल पर बाल रामायण मंदिर द्वारा भव्य कवि सम्मेलन एवं सम्मान समारोह सम्पन्न
बदायूँ। जनकवि स्वर्गीय बृजलाल गुप्त ‘सुपंथी’ की 51वीं पुण्यतिथि के अवसर पर बाल रामायण मंदिर के तत्वावधान में बालकवि सम्मेलन, सम्मान समारोह एवं पुरस्कार वितरण का आयोजन अत्यंत उत्साह और भव्यता के साथ सुपंथी स्मृति स्थल, घटपुरी, बदायूँ में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारम्भ विधिवत मंगलाचरण के साथ हुआ। इस अवसर पर नगर विधायक एवं पूर्व राज्यमंत्री श्री महेश चन्द्र गुप्ता मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, उन्होंने आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि—
“साहित्य और सनातन धर्म दोनों ही भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं। ऐसे आयोजनों से समाज में नई ऊर्जा आती है तथा आने वाली पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का सशक्त मार्ग मिलता है।”

उनके ये आशीर्वाद रूपी सुवचन सभी के लिए प्रेरणादायी सिद्ध हुए।
वहीं ग्राम प्रधान श्रीमती अनुपमा सिंह राठौर ने विशिष्ट अतिथि के रूप में कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई।
सम्मेलन में सुप्रसिद्ध कवि एवं साहित्यकारों ने अपनी ओजस्वी वाणी से श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। प्रमुख कवियों में—
डॉ. अक्षत ‘अशेष’ (ओजस्वी गीतकार) ने हिन्दी की महत्ता पर कहा—
“हिन्दी भाषा ही नहीं न ये सिर्फ जुबान,
ये अपने ‘जय हिंद’ के नारे की पहचान।”
श्री छत्रपाल सिंह ‘निडर’ ने मां सरस्वती की वंदना में स्वर साधा—
“करे वन्दना मां के चरणों में हम,
हे शारदे मां! तुमको नमन।”
श्री अभिषेक ‘अनंत’ (युवा गीतकार) ने बेटियों पर मार्मिक गीत सुनाकर सभी को भावुक किया—
“दिया जन्म तो पालो बाबू जी,
मुझे नाले में न डालो बाबू जी।”
श्री कुमार आदित्य यदुवंशी (युवा कवि) ने हिन्दी की महिमा का गौरवपूर्ण बखान करते हुए कहा—
“कितनी भी भाषाएं पढ़ लो, हो जाओ चाहे बहुभाषी,
पर तुम इसको भूल न जाना, यही बनाती है मृदुभाषी।”
कार्यक्रम में उपस्थित कवियों एवं गणमान्य जनों का सम्मान अंगवस्त्र व प्रतीकचिह्न भेंटकर किया गया। साथ ही नन्हीं प्रतिभाओं को पुरस्कार प्रदान कर प्रोत्साहित किया गया। आयोजन में श्री राकेश गुप्ता, श्री धर्मपाल सिंह, श्री हरिशंकर गुप्ता ,श्री संदीप सिंह लक्खा, श्री पंकज गुप्ता सहित अनेक प्रतिष्ठित जनों की विशेष उपस्थिति रही।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. दीपंकर गुप्त (बाल रामायण के रचयिता एवं मुख्य आयोजक) तथा सह-संचालन श्री राहुल सिंह चौहान ने कुशलता से किया। आभार व्यक्त करते हुए डॉ. दीपंकर गुप्त ने कहा—
“बाल साहित्य और संस्कृति की निरंतर साधना ही स्वर्गीय ‘सुपंथी’ जी को सच्ची श्रद्धांजलि है।”
निःसंदेह यह आयोजन न केवल साहित्यिक चेतना को पुष्ट करने वाला सिद्ध हुआ, बल्कि नई पीढ़ी को रामकथा और भारतीय संस्कृति से जोड़ने का एक सफल प्रयास भी रहा।













































































