जंग-ए-आजादी के अहम किरदार थे फखरुद्दीन अली अहमद, इंग्लैंड से लौटकर संभाली स्वतंत्रता आंदोलन की बागडोर

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बरेली । देश के पांचवें राष्ट्रपति मरहूम (स्वर्गीय) फखरुद्दीन अली अहमद को 1974 में भारत का पांचवां राष्ट्रपति चुना गया था। हालांकि, वह भारत के दूसरे मुस्लिम राष्ट्रपति थे। पहले मुस्लिम राष्ट्रपति जाकिर हुसैन थे। उनके कार्यकाल में भारत ने कई महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं का सामना किया। जंग-ए-आजादी के मुख्य किरदार फखरुद्दीन अली अहमद का जन्म (पैदाइश) 13 मई 1905 को दिल्ली में गुलाम भारत में हुआ। मगर, उनका इंतकाल (निधन) आजाद भारत में राष्ट्रपति रहने के दौरान 11 फरवरी, 1977 को हो गया था। इससे पहले राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन का भी इंतकाल पद पर रहने के दौरान हुआ। उनके पिता क़ाज़ी मुहम्मद अली असम के एक प्रतिष्ठित चिकित्सक थे। आपकी प्रारंभिक शिक्षा गुवाहाटी और बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में हुई। मगर, उन्होंने आगे की पढ़ाई सेंट कैथरीन कॉलेज, कैम्ब्रिज (इंग्लैंड) से पूरी की। यहां से कानून की डिग्री प्राप्त कर भारत लौटे। इसके बाद जंग-ए- आजादी में कूद गए। 1925 में जब वह इंग्लैंड में थे, तब महात्मा गांधी से मुलाकात हुई थी। भारत लौटने के बाद जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े। इसके बाद 1931 में उन्होंने कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ली और असम में स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। असम में गोरों के खिलाफ बिगुल बजाने वाले आप ही थे। 1935 में असम विधानसभा के लिए चुने गए। मगर, 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। वह तीन साल तक जेल में रहे। देश की आजादी के बाद फखरुद्दीन अली अहमद ने असम की राजनीति में मुख्य भूमिका निभाई। वह कई बार असम विधानसभा के सदस्य बने और भारत सरकार में विभिन्न पदों पर कार्य किया। 1952, 1957 और 1962 में लोकसभा के सदस्य बने थे। उन्होंने विभिन्न मंत्रालयों में कार्य किया। इसमें 1955 से 1957 तक केंद्र में खाद्य और कृषि मंत्री, 1966 से 1967 तक श्रम मंत्री, 1970 से 1974 तक शहरी विकास मंत्री बने थे। उनका प्रशासनिक अनुभव और शांत स्वभाव उन्हें राजनीति में सम्मानजनक स्थान दिलाने में मददगार साबित हुआ। फखरुद्दीन अली अहमद 1974 में देश के पांचवें राष्ट्रपति चुने गए। मगर, उनका इंतकाल (मृत्यु) 11 फरवरी, 1977 को नई दिल्ली में हो गया। मगर, उनके कार्यकाल में सबसे बदनुमा दाग 1975 में लगाया गया आपातकाल (इमरजेंसी) था। पूर्व पीएम इंदिरा गांधी के आग्रह पर उन्होंने 25 जून 1975 को देश में आपातकाल की घोषणा पर हस्ताक्षर किए। इसकी व्यापक रूप से आलोचना हुई। 11 फरवरी 1977 को अपने कार्यकाल के दौरान ही फखरुद्दीन अली अहमद का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। फखरुद्दीन अली अहमद की राजनीतिक विरासत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और लोकतांत्रिक प्रशासन में योगदान को हमेशा याद किया जाता है। भारतीय राजनीति में अपनी सादगी, ईमानदारी और प्रतिबद्धता के लिए पहचाने जाते हैं। उनकी याद में नई दिल्ली में “फखरुद्दीन अली अहमद मेमोरियल” स्थापित किया गया था। इसके अलावा शिक्षा और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उनके नाम पर कई पुरस्कार और संस्थान स्थापित किए गए हैं। जंग-ए-आजादी के नायक को देश खिराज-ए-अकीदत (श्रद्धांजिक) पेश कर रहा है। बदायूं से की शादी, पत्नी दो बार बरेली से बनीं सांसद पूर्व राष्ट्रपति की शादी बरेली मंडल के बदायूं जिले की शेखपुर विधानसभा निवासी बेगम आबिदा अहमद के साथ 9 नवम्बर, 1945 को हुई। उनकी पत्नी उत्तर प्रदेश की बरेली लोकसभा सीट से उपचुनाव जीतकर जून, 1981 में सांसद निर्वाचित हुईं। यह सीट सांसद मिसरयार खां के इंतकाल के बाद खाली हुई थी। उन्होंने बरेली की जनता में अपनी विशिष्ट साख बनाई। इसी वजह से बरेली संसदीय सीट से वह 1984 में दोबारा लोकसभा पहुंचीं। मगर, 1989 में भाजपा सांसद एवं वर्तमान में झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार से चुनाव हार गई थीं। उनके नाम से बेगम आबिदा एक्सप्रेस ट्रेन चलती थी। मगर, अब इस ट्रेन का नाम सत्याग्रह एक्सप्रेस हो गया है।उनकी पत्नी का दिसंबर 2003 में इंतकाल हुआ।

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