हाकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद

major-dhyan-chand
WhatsAppImage2026-02-15at42216PM1
previous arrow
next arrow

बरेली ।मेजर ध्यानचंद ने भारतीय हाकी के परचम को पूरे विश्व में फहराया ।उन्होने अपनी असाधारण खेल प्रतिभा से भारत को तीन बार ओलंपिक खेलों में स्वार्ण पदक विजेता बनाया ।बे जब मैदानी गोल करते थे तो दर्शक वाह वाह कर उठते थे ।इसलिये उन्हें हाकी का जादूगर कहा जाता है ।29 अगस्त उनके जन्मदिन देश में खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है ।
बे हाकी के एक बेहतरीन खिलाड़ी थे । उन्होने भारतीय हाकी को नई उंचाईयों तक पहुंचाया ।

ReferralCodeLLVR11
previous arrow
next arrow
WhatsAppImage2024-06-13at1242061
previous arrow
next arrow
WhatsAppImage2025-06-11at40003PM
previous arrow
next arrow

ध्यानचंद ने आखिरी अंतराष्ट्रीय मैच 1948 में खेला। अपने अंतराष्ट्रीय करियर के दौरान वे 400 से अधिक गोल कर चुके थे। भारतीय सरकार ने अब तीसरा और उनके दौर में दूसरे स्थान का नागरिक सम्मान पद्मभूषण प्रदान 1956 में किया। उनका जन्मदिन भारत में नेशनल स्पोर्ट्स डे के तौर पर 29 अगस्त को मनाया जाता है।

ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त को इलाहाबाद (उत्तरप्रदेश) में हुआ। राजपूत परिवार में जन्में ध्यानचंद रूपसिंह नाम के हॉकी खिलाड़ी के बड़े भाई थे। उनके पिता समेश्वर सिंह ब्रिटिश इंडियन आर्मी में थे और आर्मी के लिए हॉकी खेलते थे। ध्यानचंद के एक और भाई का नाम मूलसिंह था। उनके पिता के बार बार होने वाले ट्रांस्फर के चलते ध्यानचंद को कक्षा छह के बाद पढाई छोड़नी पड़ी। उनका परिवार आखिर में उत्तरप्रदेश के झांसी में ही बस गया।
बचपन में ध्यानचंद का हॉकी पर कोई ध्यान नहीं था और उन्हें पहलवानी पसंद थी। ध्यानचंद ने भारतीय आर्मी ज्वाइन की उस समय उनकी उम्र 16 साल थी। वह रात में खेल की प्रेक्टिस करते थे और चांद के निकलने का इंतजार भी क्योंकि चांद निकलने के बाद ही उन्हें दिखाई देने लगता था। उस दौर में बाहर लाइट नहीं हुआ करती थी। चांद के इंतजार के कारण ही उनके दोस्त उन्हें चंद पुकारने लगे और उनका नाम ध्यानचंद पड़ा
1922 से 1926 के बीच ध्यानचंद ने सिर्फ आर्मी हॉकी और रेजिमेंट गेम्स खेले। बाद में उन्हें इंडियन आर्मी टीम के लिए चुन लिया गया जिसे न्यूजीलैंड जाकर खेलना था। इस टीम ने 18 मैच जीते, 2 ड्रा हो गए और एक मैच टीम हार गई। देखने आए सभी दर्शक टीम के प्रशंसक हो गए। भारत लौटते ही ध्यानचंद को लांस नायक बना दिया गया था।

ओलंपिक में बेहतरीन टीम भेजने के बाद, नई बनी हुई इंडियन हॉकी फेडरेशन ने 1928 के एमस्टरडैम ओलंपिक के लिए बढिया टीम तैयार करना शुरू कर दिया। 1925 में कई राज्यों के बीच टूर्नामेंट रखा गया। पांच टीमों ने इसमें भाग लिया जिसमें आर्मी ने ध्यानचंद को युनाइटेड प्रोविंस नाम की टीम में खेलने की इजाजत दी।

एमस्टरडैम में हुए ओलंपिक में 1928 में भारतीय टीम के पहले ही मैच में ध्यानचंद ने ऑस्ट्रिया के खिलाफ 3 गोल दागे। अगले दिन भारत ने बैल्जियम को 9-0 से हराया हालांकि ध्यानचंद ने सिर्फ एक गोल दागा था। अगला मैच भारत ने डेनमार्क के खिलाफ जीता जिसमें कुल 5 में से 3 गोल ध्यानचंद ने किए थे। दो दिन बाद, ध्यानचंद ने स्विट्जर्लैंड के खिलाफ 4 गोल किए और भारतीय टीम को जीत दिलाई।

फायनल मैच 26 मई को नीदर्लैंड के खिलाफ था। भारतीय टीम के अच्छे खिलाड़ी फिरोज खान, अली शौकत, खेर सिंह बीमार थे। यहां तक की ध्यानचंद का भी स्वास्थ्य खराब था। इसके बावजूद भारत यह मैच 3-0 से जीतने में सफल रही। इसमें ध्यानचंद ने 2 गोल किए। इस तरह भारत ने हॉकी का पहला गोल्ड मैडल जीता। ध्यानचंद ओलंपिक में सबसे अधिक गोल करने वाले खिलाड़ी थे।

एक अखबार ने ध्यानचंद के लिए लिखा, ‘ये हॉकी का मैच नहीं था बल्कि जादू था। ध्यानचंद असलियत में हॉकी के जादूगर हैं।’

1951 में कैप्टन ध्यानचंद के सम्मान में नेशनल स्टेडियम में ध्यानचंद टूर्नामेंट रखा गया। कई सफल टूर्नामेंटों में हिस्सा लेने के बाद, 1956 में 51 वर्ष की उम्र में कैप्टन ध्यानचंद आर्मी से मेजर की पोस्ट से रिटार्यड हो गए। भारत सरकार ने उन्हें इसी वर्ष पद्मभूषण से सम्मानित किया।

रिटायर्मेंट के बाद, राजस्थान के माउंटआबू में वह हॉकी कोच के रूप में कार्य करते रहे। इसके बाद पाटियाला के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स में वह चीफ हॉकी कोच बन गए। यहां कई साल तक वे इस पद पर रहे। अपने जीवन के आखिरी दिनों में ध्यानचंद अपने गृहनगर झांसी (उत्तरप्रदेश) में रहे। मेजर ध्यान चंद का 3 दिसंबर 1979 में ऑल इंडि
या इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस दिल्ली में स्वर्गवास हो गया। उनकी रेजीमेंट पंजाब रेजीमेंट ने पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया।
यह अतयंत प्रसन्नता का विषय है कि वर्तमान केंद्र सरकार ने खेल रत्न सम्मान मेजर ध्यानचंद के नाम पर देने कीं घोषणा की है ।सरकार कीं इस अभूतपूर्व पहल से मेजर ध्यानचंद सदैव खिलाडियों के प्रेरणा स्रोत वने रहेंगे और उनका नाम सदैव अमर रहेगा ।


सुरेश बाबू मिश्र सेवानिवृत प्रधानाचार्य

WhatsAppImage2024-10-20at41111PM1
previous arrow
next arrow
WhatsAppImage2023-04-17at53854PM4
previous arrow
next arrow
Home
Live TV
VIDEO NEWS
Verified by MonsterInsights