मासूमियत पर दरिंदगी का हमला: आखिर क्यों नहीं थम रहे नन्हीं बच्चियों से दुष्कर्म के मामले?
बदायूँ। थाना अलापुर क्षेत्र में चार वर्षीय मासूम बच्ची के अपहरण और उसके साथ कथित दुष्कर्म की घटना ने पूरे जिले ही नहीं, बल्कि प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। पुलिस ने घटना के मुख्य आरोपी 58 वर्षीय अबरार को मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार कर लिया। आरोपी के दोनों पैरों में गोली लगी, जबकि जवाबी फायरिंग में एक पुलिस उपनिरीक्षक भी घायल हो गए। पुलिस की त्वरित कार्रवाई से आरोपी कानून के शिकंजे में पहुंच गया, लेकिन इस घटना ने समाज के सामने एक बड़ा सवाल फिर खड़ा कर दिया है—आखिर मासूम बच्चियां कब तक दरिंदगी का शिकार होती रहेंगी?राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की वर्ष 2023 की रिपोर्ट इस चिंता को और गंभीर बनाती है। रिपोर्ट के अनुसार देशभर में वर्ष 2023 के दौरान बच्चों के विरुद्ध 1,77,335 अपराध दर्ज किए गए। इनमें 67,694 मामले पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत दर्ज हुए। यह आंकड़े बताते हैं कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराध देश के सामने एक गंभीर सामाजिक चुनौती बन चुके हैं।बदायूँ जनपद में भी हाल के महीनों में मासूम बच्चियों से जुड़े कई गंभीर मामले सामने आए हैं। अलापुर की ताजा घटना ने एक बार फिर लोगों में आक्रोश पैदा कर दिया है। हालांकि 1 जनवरी 2026 से 28 जून 2026 तक जिले में ऐसे मामलों की आधिकारिक समेकित संख्या अभी सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन लगातार सामने आ रही घटनाएं चिंता का विषय हैं।
क्या कहता है मनोविज्ञान?मनोवैज्ञानिकों और अपराध विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे जघन्य अपराध केवल यौन इच्छा का परिणाम नहीं होते, बल्कि इनके पीछे कई सामाजिक और मानसिक कारण होते हैं। इनमें विकृत मानसिकता, महिलाओं और बच्चों को कमजोर समझने की सोच, सहानुभूति का अभाव, हिंसक व्यक्तित्व, नशे की लत, कानून का भय कम होना तथा अपराध करके बच निकलने का विश्वास प्रमुख कारण माने जाते हैं।विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि ऐसे अपराध किसी एक आयु वर्ग तक सीमित नहीं हैं। युवाओं, अधेड़ों और बुजुर्गों—सभी आयु वर्ग के लोग ऐसे मामलों में आरोपी पाए गए हैं। इसलिए केवल उम्र के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
क्या केवल कड़ी सजा ही समाधान है?अपराध विशेषज्ञों का मानना है कि पुलिस की त्वरित कार्रवाई और दोषियों को शीघ्र सजा निश्चित रूप से अपराधियों में भय पैदा करती है, लेकिन केवल कठोर दंड ही पर्याप्त नहीं है। समाज में नैतिक शिक्षा, परिवार की जिम्मेदारी, बच्चों को ‘गुड टच-बैड टच’ की जानकारी, स्कूलों में जागरूकता अभियान, डिजिटल माध्यमों पर अभिभावकों की निगरानी और पॉक्सो मामलों का समयबद्ध निस्तारण भी उतना ही आवश्यक है।समाज को भी निभानी होगी जिम्मेदारीविशेषज्ञों का कहना है कि यदि परिवार बच्चों की गतिविधियों पर सतर्क नजर रखे, स्कूल सुरक्षा शिक्षा को प्राथमिकता दें, समाज संदिग्ध गतिविधियों की तत्काल सूचना पुलिस को दे और न्याय व्यवस्था त्वरित निर्णय सुनिश्चित करे, तो ऐसे अपराधों में प्रभावी कमी लाई जा सकती है।अलापुर की यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है कि मासूम बचपन की सुरक्षा केवल पुलिस या कानून की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व भी है। जब तक समाज सामूहिक रूप से बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं देगा, तब तक ऐसी घटनाओं पर पूरी तरह अंकुश लगाना कठिन होगा।















































































