राम मंदिर चोरी पर शंकराचार्य का बड़ा हमला: “बड़े लोगों को बचाया, छोटे कर्मचारियों को बनाया बलि का बकरा”
बदायूं। गोमाता को ‘राष्ट्रीय माता’ घोषित करने के समर्थन में निकली यात्रा के दौरान शनिवार को बदायूं पहुंचे जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार पर कई तीखे सवाल खड़े किए। उन्होंने अयोध्या स्थित राम मंदिर से जुड़े कथित चोरी प्रकरण, ट्रस्ट की कार्यप्रणाली, रोजगार, तथा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘कालनेमि’ वाले बयान पर खुलकर अपनी बात रखी।शंकराचार्य ने कहा कि राम मंदिर से जुड़े कथित चोरी प्रकरण में वास्तविक जिम्मेदारों को बचाने का प्रयास किया गया है, जबकि छोटे कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाया गया है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के युवाओं को दो करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था, लेकिन वह पूरा नहीं हो सका। रोजगार के अभाव में छोटे कर्मचारियों पर दबाव बनाया गया और यदि उन्होंने अधिकारियों के निर्देश नहीं माने होते तो नौकरी जाने का भय बना रहता।
उन्होंने आरोप लगाया कि यदि छोटे कर्मचारियों ने कोई गलत कार्य किया तो उसके पीछे उच्च अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। शंकराचार्य ने कहा कि राम मंदिर ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद गिरी, ट्रस्टी अनिल मिश्रा और ट्रस्ट के प्रमुख पदाधिकारी चंपत राय की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि चंपत राय ने इस्तीफा दिया है तो गोविंद गिरी ने इस्तीफा क्यों नहीं दिया। उनका कहना था कि प्रभावशाली लोगों को बचाने के लिए छोटे कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करना न्यायसंगत नहीं है।
शंकराचार्य ने राम मंदिर ट्रस्ट के गठन पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि उन्होंने पहले ही सुझाव दिया था कि अयोध्या विवाद की कानूनी लड़ाई लड़ने वाले पक्षकारों और प्रमुख संतों को ट्रस्ट में शामिल किया जाना चाहिए था। उनका आरोप था कि सरकार ने अपने विश्वासपात्र लोगों का ट्रस्ट बनाकर उन्हें जिम्मेदारी सौंप दी, जिससे मनमाने ढंग से निर्णय लिए गए।मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘कालनेमि’ संबंधी बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए शंकराचार्य ने कहा कि उन्होंने स्वयं भगवा वस्त्र धारण किए हैं और किसी भी जीव की हत्या नहीं की है। उन्होंने कहा कि भगवा अहिंसा और त्याग का प्रतीक है। उन्होंने सवाल किया कि यदि सरकार के कार्यकाल में हर वर्ष बड़ी संख्या में पशुओं का वध हो रहा है तो फिर असली ‘कालनेमि’ कौन है। उन्होंने कहा कि जो बाहर से साधु का स्वरूप धारण करे और भीतर से उसके आचरण अलग हों, वही कालनेमि कहलाता है। उन्होंने कहा कि जनता स्वयं तय करे कि कौन अपने आचरण से संत की मर्यादा निभा रहा है।शंकराचार्य के इन बयानों के बाद राजनीतिक और धार्मिक हलकों में नई चर्चा शुरू हो गई है। बदायूं प्रवास के दौरान उनके वक्तव्यों ने राम मंदिर ट्रस्ट, सरकार की नीतियों और धार्मिक नेतृत्व की भूमिका को लेकर कई नए सवाल खड़े कर दिए।















































































