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अब जापान में गूंजी ‘वॉटर वूमेन’ शिप्रा पाठक की आवाज, गुरुकुल आधारित नैतिक शिक्षा को बताया स्थायी विकास की कुंजी

March 26, 2026By admin0 comments
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नई दिल्ली। भारत की विख्यात “वॉटर वूमेन” शिप्रा पाठक ने जापान में आयोजित IAFOR (The International Academic Forum) के अंतरराष्ट्रीय मंच से शिक्षा, स्थिर विकास और सामाजिक न्याय के बीच समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यदि दुनिया को एक बेहतर और संतुलित भविष्य की ओर ले जाना है, तो शिक्षा को केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम न मानकर उसे नैतिकता, संवेदना और सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ना होगा। उन्होंने IAFOR संस्था का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे वैश्विक मंच संवाद और सकारात्मक परिवर्तन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

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भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले के उपनगर दातागंज की मूल निवासी शिप्रा पाठक ने जापान में आयोजित कार्यक्रम में भारत की प्राचीन गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत वह भूमि है जहाँ हजारों वर्षों पहले से ऐसी शिक्षा पद्धति विकसित हुई, जिसमें ज्ञान के साथ-साथ जीवन के मूल्यों को भी समान महत्व दिया जाता रहा है। उन्होंने कहा कि गुरुकुल प्रणाली में शिक्षा केवल करियर निर्माण तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसका उद्देश्य एक संतुलित, जिम्मेदार और संवेदनशील मनुष्य तैयार करना था। इस व्यवस्था में अनुशासन, सेवा, सहयोग, स्नेह और प्रकृति के प्रति सम्मान जैसे गुण स्वाभाविक रूप से विकसित होते थे, जो आज के समय में और अधिक प्रासंगिक हो गए हैं।
शिप्रा पाठक ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज का विद्यार्थी अंकों और प्रतिस्पर्धा के अत्यधिक दबाव में जी रहा है। उन्होंने कहा कि एक ओर हम शिक्षित युवाओं की संख्या बढ़ा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यही युवा मानसिक तनाव और डिप्रेशन जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। उनके अनुसार, यह स्थिति दर्शाती है कि शिक्षा का वर्तमान स्वरूप कहीं न कहीं अधूरा है और इसमें सुधार की आवश्यकता है।
उन्होंने सुझाव दिया कि विद्यार्थियों के मूल्यांकन में केवल परीक्षा के अंकों को ही आधार न बनाया जाए, बल्कि उनके व्यवहार, अनुशासन, प्रकृति के प्रति प्रेम और सामाजिक कार्यों में भागीदारी को भी शामिल किया जाए। उन्होंने कहा कि मार्कशीट में कम से कम 10 प्रतिशत अंक ऐसे मानकों के लिए निर्धारित किए जाने चाहिए, जो व्यक्ति के नैतिक और सामाजिक पक्ष को दर्शाते हों। इससे विद्यार्थी केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि अपने व्यक्तित्व और सामाजिक जिम्मेदारियों को भी विकसित करेंगे।
अपने अनुभव साझा करते हुए शिप्रा पाठक ने बताया कि उन्होंने भारत में 15,000 किलोमीटर की पदयात्रा की और इन यात्राओं के माध्यम से 55 लाख पौधे लगाने का कार्य किया। उन्होंने कहा कि इस दौरान उन्हें यह अनुभव हुआ कि जब शिक्षा को प्रकृति और समाज से जोड़ा जाता है, तब उसका प्रभाव अधिक गहरा और स्थायी होता है। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
अपने संबोधन के अंत में शिप्रा पाठक ने कहा कि यदि विश्व को वास्तव में स्थिर और न्यायपूर्ण विकास की दिशा में आगे बढ़ना है, तो शिक्षा में भारतीय गुरुकुल परंपरा के नैतिक मूल्यों को शामिल करना होगा। उन्होंने कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल अधिक अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन को समझना और समाज को बेहतर बनाना है। जापान में दिया गया उनका यह संदेश वैश्विक स्तर पर भारतीय शिक्षा दर्शन की महत्ता को उजागर करता है और एक संतुलित भविष्य की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करता है।

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