श्रीरामकथा के चौथे दिन कथाव्यास ने प्रभु श्रीराम के जन्म का प्रसंग भक्तों के समक्ष पेश किया
शाहजहांपुर। मुमुक्षु आश्रम में चल रही श्री रामकथा के चौथे दिन कथाव्यास संत विजय कौशल जी महाराज ने प्रभु श्रीराम के जन्म का प्रसंग भक्तों के समक्ष इस अंदाज में प्रस्तुत किया कि श्रोतागण मंत्रमुग्ध हो गए। कथाव्यास ने सुनाया कि मनु और शतरूपा ने नैमिषारण्य में हजारों वर्षों तक कठिन तपस्या की।

इससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उनसे वर मांगने को कहा। उन्होंने कहा कि, ” हे! प्रभु हमें आपके जैसा पुत्र चाहिए।” भगवान ने उन्हें उनके पुत्र के रूप में अवतरित होने का वरदान दिया। त्रेतायुग में भगवान विष्णु प्रभु श्रीराम के रूप में अवतरित होकर राजा दशरथ के पुत्र बने। राक्षसों के आतंक से जब त्राहि त्राहि मचने लगी तो नर, नारी, ऋषि, मुनि सब भगवान से रक्षार्थ प्रार्थना करने लगे।

अवध के चक्रवर्ती सम्राट महाराजा दशरथ संतान न होने की वजह से काफी उदास रहते थे। जब वे अपने इस कष्ट तो गुरु वशिष्ठ से कहते हैं तो वे पुत्रप्राप्ति हेतु यज्ञ करते हैं। यज्ञ के प्रसाद को ग्रहण करके राजा दशरथ को तीन रानियों से चार पुत्र प्राप्त होते हैं। प्रभु श्रीराम के जन्म पर पूरे अवध में बधाइयां बजने लगती हैं।

चहुंओर जय जयकार होने लगती है एवं पूरा नगर राजभवन की ओर दौड़ पड़ता है।
इसके अतिरिक्त कथाव्यास ने महाभारत का एक प्रसंग भी श्रोताओं के समक्ष रखा। उन्होंने कहा कि जब अर्जुन और दुर्योधन दोनों प्रभु श्रीकृष्ण से मिलने गए, तो दुर्योधन अहंकारवश उनके सिराहने बैठ गया और अर्जुन उनके चरणों के पास बैठे रहे। जब प्रभु की आंखें खुलीं तो उन्होंने कहा कि मैंने पहले अर्जुन को देखा है, इसलिए मैं उसी की सहायता पहले करूंगा। अर्जुन सहायतास्वरूप प्रभु को ही मांग लेते हैं और अंततः युद्ध में उनकी जीत होती है।
“कोई घनश्याम सा नहीं देखा
जो भी देखा वो बेवफा देखा..”
इस भजन पर श्रोता मंत्रमुग्ध होकर झूमने लगे।

कथा के आरंभ से पूर्व व्यासपीठ का पूजन मुख्य यजमान रामचंद्र सिंघल एवं उमा सिंघल ने किया। आरती के उपरांत हुए प्रसाद वितरण में डॉ आलोक कुमार सिंह, श्री ईशपाल सिंह, डॉ रामनिवास गुप्ता, मीरा अग्रवाल, मिथिलेश अग्रवाल आदि का योगदान रहा।
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