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माघ मेले में इतिहास रचा: ‘वॉटर वुमन’ शिप्रा पाठक ने पंचतत्व पर्यावरण पदयात्रा निकालकर दिया जल संरक्षण का संदेश

January 19, 2026By admin0 comments
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प्रयागराज। माघ मेले के इतिहास में पहली बार पर्यावरण संरक्षण को केंद्र में रखकर एक नई और सार्थक पहल देखने को मिली। पंचतत्व संस्था के नेतृत्व में मेला क्षेत्र में ‘पंचतत्व पर्यावरण कार्यालय’ की स्थापना कर जल, जंगल और जीवन के आपसी संबंध को रेखांकित किया गया। इसी कड़ी में जल संरक्षण को लेकर एक अनूठी पंचतत्व पर्यावरण पदयात्रा का आयोजन किया गया, जिसने साधु-संतों, श्रद्धालुओं और आमजन के बीच पर्यावरण चेतना की अलख जगा दी।

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देशभर में ‘वॉटर वुमन’ के नाम से विख्यात शिप्रा पाठक ने अपने हर्षवर्धन मार्ग स्थित पर्यावरण शिविर से गंगा घाट पुल नंबर-4 तक सैकड़ों दंडी साधकों और संतों के साथ पदयात्रा निकालकर माघ मेले को एक नई दिशा दी। पदयात्रा के दौरान जल संरक्षण, वृक्षारोपण और स्वच्छता को लेकर जो संदेश दिया गया, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि अध्यात्म और पर्यावरण एक-दूसरे के पूरक हैं।
ऐसे समय में जब मौनी अमावस्या तक माघ मेला अपने चरम पर रहा और संतों की गाड़ियों, वैभव प्रदर्शन और स्नान को लेकर चर्चाएँ व विवाद सुर्खियों में बने रहे, उसी दौर में शिप्रा पाठक ने साधना के साथ-साथ पर्यावरण चेतना को जोड़कर लोगों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित किया। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि त्रिवेणी की धारा ही स्वच्छ और सुरक्षित नहीं रहेगी तो आने वाले समय में कल्पवास, माघ मेला और महाकुंभ की परंपरा कैसे जीवित रह पाएगी।
पदयात्रा के दौरान सभी संतों और साधकों ने अपने हाथों में पौधे लेकर यात्रा की। यह दृश्य न केवल आध्यात्मिक आस्था का प्रतीक था, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण संरक्षण के संकल्प का संदेश भी दे रहा था। ‘वॉटर वुमन’ शिप्रा पाठक के एक करोड़ वृक्ष संकल्प से जुड़ने के लिए माघ मेले में आए तीर्थ यात्रियों को प्रेरित किया गया। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को तुलसी के पौधे वितरित किए गए, जिससे भारतीय संस्कृति में प्रकृति के महत्व और संरक्षण का भाव जन-जन तक पहुँचा।
गंगा घाट पर पहुँचने के बाद सभी संतों ने सामूहिक स्नान किया। इसके उपरांत श्रद्धालुओं से पोलीथीन का उपयोग न करने और घाटों को स्वच्छ रखने की अपील की गई। संतों ने कहा कि गंगा केवल नदी नहीं, बल्कि जीवनदायिनी मां है, और उसकी स्वच्छता बनाए रखना हर श्रद्धालु का कर्तव्य है। घाटों पर फैली गंदगी और प्लास्टिक कचरा केवल पर्यावरण को ही नहीं, बल्कि हमारी आस्था को भी नुकसान पहुँचाता है।
कार्यक्रम में उपस्थित पीपलेश्वर महादेव के प्रबंधक हर-हर महादेव गुरु जी ने कहा कि शिप्रा पाठक द्वारा किया जा रहा पर्यावरणीय कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि आज जल संरक्षण पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में विश्व युद्ध जल के लिए हो सकता है। उन्होंने पंचतत्व संस्था को इस दिशा में हर संभव सहयोग देने का आश्वासन भी दिया।
भैरव मठ के महंत स्वामी श्रृंगेरी महाराज जी ने “जल है तो कल है” का उद्घोष करते हुए कहा कि पंचतत्व संस्था द्वारा चलाए जा रहे जल संरक्षण अभियान को उनका अखाड़ा पूर्ण समर्थन देगा। उन्होंने कहा कि साधु-संतों की भूमिका केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि समाज और प्रकृति के संरक्षण में भी उनकी सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।
संत समागम में उपस्थित संतों, पत्रकारों और श्रद्धालुओं का आभार व्यक्त करते हुए शिप्रा पाठक ने कहा कि जल संरक्षण के लिए मिल रहा व्यापक सहयोग उनकी शक्ति और संकल्प को और मजबूत कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “यदि त्रिवेणी में जल नहीं होगा तो माघ मेला और महाकुंभ की कल्पना भी संभव नहीं है। इसलिए पूजन के साथ-साथ जल संरक्षण को अपने दैनिक आचरण का हिस्सा बनाना होगा।”
उन्होंने यह भी कहा कि घाटों को पोलीथीन-मुक्त बनाना केवल सरकार या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यहाँ आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं की सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी समझ ले तो गंगा और त्रिवेणी को स्वच्छ और निर्मल बनाए रखना कोई कठिन कार्य नहीं है।
पदयात्रा का शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ गुरुकुल के विद्यार्थियों द्वारा किया गया। मंत्रों की गूंज और शंखनाद के बीच शुरू हुई यह यात्रा आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर रही। पदयात्रा में मातृ शक्तियों की भी बड़ी संख्या में सहभागिता रही, जिन्होंने पर्यावरण संरक्षण के संदेश को और सशक्त बनाया। सैकड़ों पंचतत्व साधकों के साथ-साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी इस यात्रा में शामिल हुए।
माघ मेले में आयोजित यह पंचतत्व पर्यावरण पदयात्रा केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक संदेश थी—कि यदि आस्था को बचाना है तो प्रकृति को बचाना होगा। जल, जंगल और जमीन के संरक्षण के बिना न तो संस्कृति सुरक्षित रह सकती है और न ही परंपराएँ। ‘वॉटर वुमन’ शिप्रा पाठक की यह पहल माघ मेले के इतिहास में एक नई मिसाल के रूप में याद की जाएगी, जिसने अध्यात्म के साथ पर्यावरण चेतना को जन आंदोलन का रूप देने का प्रयास किया है।

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