जैन समाज के चल रहे महापर्व में सप्तम दिवस आज हुई उत्तम तप धर्म की पूजा
बरेली। पर्वाधिराज दस लक्षण पर्व के सप्तम दिवस भाद्र पद के सूद ग्यारस को मंदिरों में धूम रही। पीत वस्त्रों को धारण कर इंद्रो ने प्रासुक जल से श्री जी का अभिषेक, शांति धारा की और नित्य नियम पूजा उपरांत उत्तम तप धर्म का विधान किया गया। मध्याह्न उपरांत धर्म चर्चा की प्रस्तावना में युवा मंच के सौरभ जैन ने कहा कि बिना तपे घी भी प्राप्त नहीं होता, बिना तपे घड़ा भी मजबूत नहीं होता, बिना तपे सोना भी शुद्ध नहीं होता और बिना तप किए आत्मा भी परमात्मा नहीं बन पाती, वैसे तो वास्तविक तप मुनियों द्वारा ही संभव है किंतु एक आम मनुष्य जो व्रत के माध्यम से तप कर रहा है, अपने अंदर झांक कर देखे उसमें कितनी विकृति, दोष, दुर्बलता नष्ट हुई है, यदि भीतर से निखार आ गया है तो तप है, नहीं तो यह शरीर को सुखाने की प्रक्रिया है।
श्री पार्श्वनाथ मंदिर के प्रवचन कर्ता राजेश जैन जी ने सहमति देते हुए कहा की “उत्तम तप निवांछित पाले, सो नर कर्मशत्रु को टाले।” लोहा जब तक तप्त होता है, उसमें जंग नहीं लगती। उन्होंने आगे कहा, “यह तन तेरा कोयला, भो भो काला होए, तप अग्नि में गर जले, चांदी चांदी होए।”
उन्होंने बताया लोग दो प्रकार के लोग होते हैं, पहले तपधारी, दूसरे जो खाने पीने और भौतिक सुख सुविधाओं को सच्चा सुख, मस्त रहने का माध्यम मानते हैं, दुर्गति को प्राप्त होते हैं।
धर्म चर्चा में सुनीता जैन ने कहा कि “बिना इच्छा तप साधना, फल होगा निर्वाण। सम्यक तप ही परम सुख, करो आत्म कल्याण। “तत्वार्थ सूत्र में कहा गया है ‘इच्छा निरोधो तपाः’।
उन्होंने आगे कहा, उत्तम तप तीन प्रकार होते हैं। जैसे शारीरिक तपः व्रत, उपवास और तपस्या करना। वाचिक तपः वाक संयम और किसी के अशब्द बोलने पर भी मौन रहना। मानसिक तपः मन में समता रखना और प्रतिकूल प्रसंगों को समता से सहना।
संध्या काल में सामूहिक आरती उपरांत भजन संध्या हुई।
इस अवसर पर सतेंद्र जैन चाहबाई, प्रकाश चन्द्र जैन, राम कुमार जैन, संजय जैन, विकास जैन, अर्चना जैन, भूपेंद्र जैन, दिनेश जैन, अंजू जैन, मानसी जैन, दिव्या जैन, निशि जैन, मिनेश जैन, लवी जैन आदि उपस्थित रहे।













































































