विकसित भारत 2047 का मार्ग विषय पर देश के वैज्ञानिकों और शोधार्थियों ने किया मंथन
बरेली। आई सी ए आर – भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान और विज्ञान भारती (ब्रज प्रांत) के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय भारतीय पशु विज्ञान समागम में देश के विभिन्न राज्यों से आए लगभग 350 से अधिक वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, युवा शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने पशुधन स्वास्थ्य, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए आई) और ग्रामीण आत्मनिर्भरता जैसे गंभीर विषयों पर वैचारिक मंथन किया। इस समागम में मुख्य अतिथि के रूप में महात्मा ज्योतिबा फुले (एम जे पी) रुहेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर के. पी. सिंह उपस्थित रहे।समागम में इस वर्ष का मुख्य विषय परंपरा से प्रौद्योगिकी : विकसित भारत 2047 के लिए जैव- विज्ञान का मार्ग था। दो दिनों तक चले अलग अलग 6 सत्र में देश के विभिन्न राज्यों से आए वैज्ञानिकों ने ग्रामीण आत्मनिर्भरता पर वैचारिक मंथन किया।
इस अवसर संस्थान के आयोजन सचिव प्रोफेसर राघवेंद्र सिंह ने समागम की संक्षिप्त रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए बताया कि 6 सत्रों में 22 आमंत्रित व्याख्यान हुए। देश भर के युवा वैज्ञानिकों द्वारा 40 मौखिक प्रस्तुतियाँ और 41 पोस्टर प्रस्तुतियाँ दी गईं । इस प्रकार कुल 100 से अधिक उच्च स्तरीय शोध पत्र पढ़े गए, जो भविष्य में पशुधन स्वास्थ्य और संधारणीय विकास की दिशा तय करेंगे।
मुख्य अतिथि के रूप में महात्मा ज्योतिबा फुले (एमजेपी) रुहेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर के. पी. सिंह ने अपने संबोधन में युवा शोधार्थियों की ऊर्जा की सराहना की और कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान का समन्वय ही ‘विकसित भारत 2047’ के संकल्प को साकार करेगा।डॉ. मनीष कुमार चेतली (निदेशक, केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान – मखदूम) ने युवाओं को स्टार्टअप और उद्यमिता से जुड़ने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा, “ज्ञान जब व्यावहारिक अनुभव से जुड़ता है, तब नवाचार का जन्म होता है। बकरी का दूध केवल ‘गरीब की गाय’ का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह अपने औषधीय गुणों के कारण भविष्य का ‘फ्यूचर मिल्क’ है। युवाओं को पशुपालन क्षेत्र में नए स्टार्टअप स्थापित कर रोजगार के अवसर पैदा करने चाहिए।”
इस अवसर पर डॉ. अशोक मोहंती (निदेशक, केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान, मेरठ) ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत की जीडीपी में पशुधन का योगदान 5.5 प्रतिशत से अधिक है। उन्होंने भविष्य की प्राथमिकताओं को रेखांकित करते हुए कहा, “हमें पारंपरिक प्रणालियों से आगे बढ़कर ‘जीनोमिक्स’, ‘प्रिसिजन ब्रीडिंग’ और ‘एआई’ जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाना होगा। युवा वैज्ञानिकों को पशु चिकित्सा के साथ-साथ पायथन जैसी कोडिंग भाषाएं भी सीखनी चाहिए, ताकि वे डिजीज सर्विलांस और डेटा प्रेडिक्शन में एआई का प्रभावी उपयोग कर सकें।”
इस अवसर पर संयुक्त निदेशक (शोध) डॉ. एस. के. सिंह ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने शोध में छात्राओं की बढ़ती भागीदारी की सराहना की और युवा वैज्ञानिकों को देश के विकास में सतत योगदान देने के लिए प्रेरित किया।
विज्ञान भर्ती के क्षेत्रीय संगठन मंत्री आशुतोष सिंह ने कहा कि विज्ञान तभी सार्थक है जब वह समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति (किसानों और पशुपालकों) के जीवन में बदलाव लाए। उन्होंने ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स में भारत की छलांग (93वें स्थान से 39वें स्थान पर आना) का उल्लेख करते हुए देश में बढ़ रहे स्टार्टअप कल्चर को सराहा। उन्होंने विज्ञान भारती के पूर्व राष्ट्रीय संगठन मंत्री स्वर्गीय जयंतराव सहस्रबुद्धे को उनकी पुण्यतिथि पर याद करते हुए उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प दोहराया।
डॉ. संध्या अग्रवाल (महासचिव, ब्रज प्रांत, विज्ञान भारती): ने समागम के अनुशासित संचालन और वैज्ञानिक स्तर की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि इन दो दिनों में जैव-प्रौद्योगिकी, जैव-सुरक्षा और वन-हेल्थ जैसे विषयों पर हुए सत्र युवाओं के लिए अत्यंत प्रेरणादायी रहे।
समागम के अंतिम चरण में विभिन्न तकनीकी सत्रों (जैसे: ट्रांसफॉर्मिंग एनिमल हेल्थ, वन हेल्थ और बायो-सिक्योरिटी) में उत्कृष्ट शोध पत्र और पोस्टर प्रस्तुति देने वाले छात्र-छात्राओं को मुख्य अतिथि एवं गणमान्य अतिथियों द्वारा प्रशस्ति पत्र और मेडल देकर सम्मानित किया गया। ओरल और पोस्टर प्रस्तुतियों में हर्ष, विनय कुमार, शिवांश, विवर सिंह, नम्रता अग्रवाल और लवीना समानी सहित कई अन्य शोधार्थियों ने प्रथम व द्वितीय स्थान प्राप्त किया।
कार्यक्रम का संचालन संस्थान की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ हिमानी धांजे द्वारा किया गया जबकि धन्यवाद ज्ञापन कार्यक्रम के आयोजन सचिव डॉ प्रवीण सिंह द्वारा किया गया इस अवसर पर संस्थान एवं विज्ञान भर्ती के पदाधिकारीगण मौजूद रहे । निर्भय सक्सेना















































































