इन चार यौगिक क्रियाओं से शरीर पर नहीं पड़ेगा प्रदूषण का असर

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दिल्ली । दिवाली के बाद एक बार फिर से दिल्ली से लेकर देश के सभी प्रमुख बड़े शहरों में प्रदूषण की चादर छा गई है। चिकित्सा विशेषज्ञों के मुताबिक, इस प्रदूषण में ऐसे तमाम छोटे-छोटे कण होते हैं जो ब्लड में भी जाकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों को न्यौता देते हैं, लेकिन भारतीय पुरातन चिकित्सा पद्धति की कुछ यौगिक क्रियाओं से प्रदूषण के खतरनाक स्तर में भी शरीर के भीतर इनका असर बहुत कम होने का दावा किया गया है। अखिल भारतीय योग शिक्षक महासंघ की ओर से देश के अलग-अलग हिस्सों में बीते कुछ दिनों में प्रदूषण के दौरान किए गए शोध से पता चला है कि यौगिक क्रियाओं से प्रदूषण का असर शरीर पर न सिर्फ कम पड़ा है, बल्कि अस्थमा जैसी गंभीर बीमारियों में भी मरीज को प्रदूषण में राहत मिली है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च समेत ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ आयुर्वेद के विशेषज्ञ भी मानते हैं कि यह चार यौगिक क्रियाएं शरीर को प्रदूषण में भी बचाती हैं।  अखिल भारतीय योग शिक्षक महासंघ ने बीते दो सालों में देश के अलग-अलग हिस्सों में बढ़ते प्रदूषण के दौरान चार यौगिक क्रियाओं के माध्यम से शरीर पर पड़ने वाले असर का अध्ययन किया गया। शिक्षक योग शिक्षक महासंघ के मुखिया योगगुरु मंगेश त्रिवेदी कहते हैं कि उनके 1500 शिक्षकों ने देश के उत्तर भारत और समुद्री इलाकों के प्रमुख शहरों में यह जानने की कोशिश की कि यौगिक क्रियाओं से प्रदूषण में किस तरह राहत मिलती है। इसके लिए बाकायदा 1500 शिक्षकों ने लगभग 15000 ऐसे मरीजों और सामान्य लोगों का चयन किया जिनका अस्थमा और अधिक उम्र के चलते प्रदूषण में सांस लेने के दौरान दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद, गुड़गांव, मेरठ, आगरा, लखनऊ, पटना, चंडीगढ़, जयपुर, मुंबई, पुणे, नासिक, नागपुर, चंद्रपुर, चेन्नई, समेत हल्द्वानी और उत्तर भारत के अन्य प्रमुख प्रदूषित शहरों का चयन किया। यहां अलग-अलग आयु वर्ग के 15000 मरीज को प्रदूषण के दौरान घर के भीतर चार योग क्रियाओ को कराया गया। इस अध्ययन को करने वाले अखिल भारतीय आयुर्वेदिक योग शिक्षक संघ के प्रमुख मंगेश त्रिवेदी बताते हैं कि इन शहरों में 15 हजार मरीजों को कपालभाति, अनुलोम विलोम, जलनेति, और कुंजल की क्रिया कराई गई। वह कहते हैं कि सभी क्रियाएं घर के अंदर बंद दरवाजे में की गई ताकि बाहर के प्रदूषण का असर इन योग क्रियाओं के दौरान बहुत ज्यादा ना पड़े। वह कहते हैं कि उनके इस अध्ययन में तकरीबन दस हजार मरीज ऐसे थे जो बदहाल प्रदूषण के चलते इनहेलर का समय-समय पर अधिक इस्तेमाल करते थे। उनका कहना है कि बीते दो सालों के दौरान लगातार प्रदर्शन बढ़ने पर किए गए शोध के नतीजे बहुत चौंकाने वाले मिले। अखिल भारतीय योग शिक्षक संघ के इस शोध के आंकड़ों के मुताबिक जो मरीज बढ़ते प्रदूषण में इनहेलर का अधिक इस्तेमाल करते थे वह इन यौगिक क्रियाओं के बाद इनहेलर का इस्तेमाल सिर्फ उतना ही करते थे जितना की अस्थमा के अटैक के समय या फिर सामान्य प्रक्रिया में इस्तेमाल किया जाता था। बल्कि कई लोगों का तो इनहेलर इन योग क्रियाओं के बाद और भी कम हो गया। आंकड़ों के मुताबिक, यह सभी दस हजार मरीज बढ़ते प्रदूषण के चलते सामान्य दशा में इनहेलर लेने की प्रक्रिया को तीन से चार गुना ज्यादा बढ़ा देते थे। लेकिन इन क्रियाओं के रेगुलर और समयबद्ध तरीके से करने पर बढ़े प्रदूषण में भी इन लोगों को इनहेलर इस दशा में लेना पड़ा जैसा कम प्रदूषण के चलते लिया जाता था। अखिल भारतीय योग शिक्षक संघ के आंकड़ों के मुताबिक 85 फीसदी मरीजों में सिर्फ प्रदूषण के चलते इनहेलर की बढ़ी डोज की संख्या में कमी दर्ज की गई। जबकि 15 फ़ीसदी मरीज में डोज कम हुई लेकिन क्रॉनिक अस्थमा के चलते उन पर प्रदूषण का असर भी दिखा। इसी तरह जो इस अध्ययन में पांच सौ उन सामान्य लोगों को भी चुना गया था जो कि बढ़ते प्रदूषण के चलते अलग-अलग तरीकों की समस्याओं से परेशान हो जाते थे। इसमें नाक बंद होने से लेकर गले में खराश और सांस लेने की तकलीफ शामिल थी। योगगुरु मंगेश त्रिवेदी कहते हैं कि जबकि  अन्य पांच हजार लोगों में चारों यौगिक क्रियाओं को कराने के बाद लगातार दो साल तक इनको देखा गया। सभी लोगों में अनुलोम विलोम, कपालभाति, जलनेति क्रिया और कुंजल क्रिया के बाद प्रदूषण के असर के बावजूद न सिर्फ सांस लेने में आसानी महसूस हुई बल्कि बंद नाक और गले में तमाम तरह की दिक्कतों से भी निजात मिली। दो साल तक लगातार बढ़े प्रदूषण के दौरान अपनाई गई इस कर योग क्रियाओं के माध्यम से अंतिम निष्कर्ष यही निकला कि यह सभी क्रियाएं प्रदूषण के खतरनाक स्तर में भी सबसे कारगर हैं जो शरीर पर उसके दुष्प्रभाव को रोकती हैं।  अखिल भारतीय योग शिक्षक महासंघ के मंगेश त्रिवेदी कहते हैं कि पुरातन चिकित्सा पद्धति के माध्यम से गंभीर से गंभीर बीमारियों को रोकने और उसके निदान मैं योग क्रियो से लेकर अन्य चिकित्सा पद्धतियां बेहतर है और कारगर भी हैं। दो साल तक प्रदूषण के असर को यौगिक  क्रियाओं के माध्यम से कम करने के अपने इस अध्ययन की रिपोर्ट को अखिल भारतीय योग शिक्षक महासंघ ने आयुष मंत्रालय को भी सौंपा  है। मंगेश त्रिवेदी कहते हैं कि कपालभाति में सांसों को ताकत के साथ नाक के माध्यम से बाहर छोड़ जाता है। ऐसा करके फेफड़ों में शक्ति का संचार भी होता है और शरीर में प्रदूषण के चलते पहुंचे कण बाहर निकल जाते हैं। इसी तरह अनुलोम विलोम में भी सांसों की क्रियाओ से शरीर के अंदर जमा गंदगी बाहर होती है और नाक की नलिकाएं साफ होकर बेहतर सांस लेने की क्रिया में मदद करती हैं, जबकि जलनेति से नाक के अंदर जमा प्रदूषण के खतरनाक कण पानी से दूर करके बाहर किए जाते हैं और सांस लेने की प्रक्रिया को आसान किया जाता है। चौथी और अंतिम प्रक्रिया कुंजल क्रिया के तौर पर की जाती है।  मंगेश त्रिवेदी बताते हैं कि कुंजल क्रिया सप्ताह में एक या दो बार ही किया जाना चाहिए। इस क्रिया के दौरान गुनगुना पानी और उसमें थोड़ा नमक मिलाकर दो से तीन गिलास पीना चाहिए। उसके बाद गले में उंगलियों को डालकर पिया गया पूरा पानी निकाल देना चाहिए। एक तरह से उल्टी के माध्यम से शरीर में गया पूरा पानी फेफड़े और नालिका में जमा गंदगी को बाहर कर देता है। यह प्रक्रिया खाली पेट की जानी चाहिए।
इंडियन कौंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च से जुड़े रहे डॉक्टर आशुतोष मुखर्जी बताते हैं कि योग क्रिया से निश्चित तौर सांस लेने की क्रिया में बहुत फर्क पड़ता है। कपालभाति अनुलोम विलोम जलनेति और कुंजल क्रिया तो बढ़ते प्रदूषण में बहुत फायदेमंद होती है। ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ आयुर्वेद के विशेषज्ञ भी बताते हैं कि उनके शोध ने पाया है कि इस तरह की योग क्रिया से तमाम तरह की गंभीर बीमारियां और उसके दुष्प्रभाव को कम किया जा सकता है। डॉक्टर आलोक भार्गव का कहना है कि प्रदूषण के दौरान कई तरह की योगिक क्रियाएं बहुत फायदेमंद होती हैं। इसके लिए आवश्यक है कि लोगों को खुले में इन यौगिक क्रियाओं से न सिर्फ बचना चाहिए बल्कि संभव हो तो बढ़ते प्रदूषण के दौरान इनको घर के अंदर ही किया जाए तो उसका परिणाम और बेहतर हो सकता है।

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