नैमिषारण्य में बने चक्र तीर्थ में स्नान कर होता है जन उद्धार != निर्भय सक्सेना =

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में नैमिषारण्य तीर्थ गोमती नदी के बाएँ तट पर स्थित है। जहां सारे तीर्थ हैं। यहां बने चक्र तीर्थ में स्नान करने से पापों से मुक्ति तो मिलती ही है बल्कि जन उद्धार भी होता है। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्य नाथ सरकार भी नैमिषारण्य में गोमती नदी तट को और सुंदर बनाने को काफी विकास कार्य करवा रही है। ब्रह्म पुराण एवम पदम पुराण के अनुसार ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना के लिए यहां यज्ञ किया था। और अपने शरीर को दो भागों में बांट कर मनु शतरूपा की उत्पत्ति की जिसके बाद सृष्टि में नर नारी का अस्तित्व हुआ। वायु, कूर्म आदि पुराणों के अनुसार भगवान के मनोमय चक्र की नेमि (हाल) यहीं पर आकर गिरी थी। नेमिश् शब्द का अर्थ भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र के बाहरी सतह से है। कहा जाता है कि जिस स्थान पर सुदर्शन चक्र गिरा था उसे ही नैमिषारण्य कहा जाने लगा। कहा यह भी जाता है कि जिस स्थान पर चक्र पृथ्वी से टकराया था वहां पानी का झरना निकल आया। नैमिषारण्य का आकर्षण मंदिर का तालाब है।

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नैमिषारण्य में चंद्र कुंड (कल्याणी) आकार में गोल है। नैमिषारण्य मंदिर में भगवान विष्णु की स्वयंभू आकृति भी है। भगवान इंद्र ने व्रतासुर राक्षस को मारने के लिए दाधीच मुनि से उनकी हड्डियां मांगी थी। जिस पर मुनि दाधीच जी ने अपनी हड्डियां यही दी थी जिससे ब्रज बनाकर राक्षसों का संहार किया गया था। भगवान इंद्र ने भी ब्रह्म हत्या का पाप इसी कुंड में नहाकर उससे मुक्त हुए थे। मार्कण्डेय पुराण में अनेक बार इसका उल्लेख है की भगवान विष्णु जी ने सहस्त्रों रूप बनाकर 88 हजार ऋषियों को लाकर उनकी तपः स्थली के रूप में बसाया है। यह देवताओं की यज्ञ भूमि भी है। वायु पुराण अन्तर्गत माघ माहात्म्य तथा बृहद्धर्म पुराण, पूर्व भाग में इसके किसी गुप्त स्थल में आज भी ऋषियों का यज्ञ चलता रहता है। ऐसा कहा जाता है। लोमहर्षण के पुत्र सौति उग्रश्रवा ने भी यहीं ऋषियों को पौराणिक कथाएं भी सुनायी थीं। नैमिषारण्य में ही बेद व्यास जी ने महापुराण लिखे थे। पहली बार सत्यनारायण की कथा भी यहां नैमिषारण्य में की गई थी। इस नैमिषारण्य धाम का वर्णन पुराणों में भी पाया जाता है। इसलिए नैमिषारण्य की यात्रा के बिना चार धाम की यात्रा भी अधूरी मानी जाती बताई गई है। नैमिषारण्य तीर्थ का प्राचीनतम उल्लेख वाल्मीकि रामायण के युद्ध-काण्ड की पुष्पिका में भी है। पुष्पिका में उल्लेख है कि लव और कुश ने गोमती नदी के किनारे राम के अश्वमेध यज्ञ में सात दिनों में वाल्मीकि रचित काव्य का गायन किया था। शंकराचार्य ने भारत भ्रमण के समय नैमिषारण्य की भी यात्रा की थी। कवि सूरदास ने भी यहाँ निवास किया था। यही नहीं तामिल के वैष्णव संतों के ग्रंथों में भी नैमिषारण्य का उल्लेख मिलता है। ऋषि शौनक के प्रतिनिधित्व में संतों की धर्म सभा में महाभारत भी यहीं सुनायी गयी थी।

नैमिषारण्य इस मायने में अद्वितीय है सभी तीर्थ स्थानों में सबसे पहला और सबसे पवित्र होने के नाते अगर कोई यहां 12 साल तक तपस्या करता है तो सीधे ब्रह्मलोक जाते हैं। वाराह पुराण के अनुसार यहां भगवान द्वारा निमिष मात्र में दानवों का संहार होने से यह स्थान नैमिषारण्य कहलाया। रुद्रावत मंदिर नैमिषारण्य के मुख्य स्थान से 4 किलोमीटर दूर है। यह वह स्थान है जहां भगवान शिव ने रुद्र तांडवम करने के बाद खुद को ठंडा करने के लिए गोमती नदी में प्रवेश किया और तपस्या में लग गए।रुद्रावत में गोमती नदी में गुप्तेश्वर शिव लिंग है जहां बेलपत्री, 5 फल चढ़ाने पर कुछ नदी में नीचे चले जाते हैं और जो वापस आते हैं वही प्रसाद होता है। यहां ललिता देवी मंदिर, हनुमान गढ़ी आदि सिद्ध मंदिर भी हैं। सावन माह में कायस्थ चेतना मंच सदस्यों ने की नैमिषारण्य तीर्थ यात्रा पवित्र सावन माह में कायस्थ चेतना मंच, बरेली के सदस्यों ने सीतापुर में नैमिषारण्य तीर्थ यात्रा कर चक्र कुंड एवम गुप्तेश्वर आदि मंदिर के दर्शन किए। रविवार 16 जुलाई को सीतापुर में स्थित महाभारत कालीन नैमिषारण्य (नीमसार) तीर्थ स्थल का भी भ्रमण कर भगवान भोलेनाथ के समक्ष शीश नवाया और भगवान ब्रह्मा जी के चक्र से बने चक्र कुंड में स्नान एवम आचमन किया । कायस्थ चेतना मंच अध्यक्ष संजय सक्सेना के नेतृत्व में एक बस से सदस्य गण रविवार 16 जुलाई को सीतापुर जिला स्थित नैमिषारण्य गए और मंदिर भ्रमण किया । डॉ पवन सक्सेना, अमित सक्सेना बिंदु, डॉ पूजा सक्सेना, मुकेश सक्सेना, वरिष्ठ पत्रकार निर्भय सक्सेना, चंद्र भूषण शील, अविनाश सक्सेना, सुधीर मोहन, पूर्व पार्षद चमन सक्सेना, अनुपम चमन, रवि सक्सेना, वी के सक्सेना, अभय, ललिता सक्सेना, मीरा मोहन, सुरभि शील, मेघांश शील आदि उपस्थित रहे। नैमिषारण्य तीर्थ इस मायने में अद्वितीय है। निर्भय सक्सेना

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