आल्हा और कवि सम्मेलन से हुआ मुमुक्षु महोत्सव का समापन
शाहजहांपुर। मुमुक्षु महोत्सव की समापन संध्या पर वीर रस से ओत प्रोत आल्हा और कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। लोक गायन हेतु मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ से पुरुस्कृत दूरदर्शन और आकाशवाणी की युवा कलाकार शीलू सिंह राजपूत ने चंदेली कवि द्वारा लिखित आल्हा को योद्धा के हावभाव में प्रस्तुत करके दर्शकों का दिल जीत लिया। आल्हा के बाद अखिल भारतीय कवि सम्मेलन आयोजित किया गया। देश के विभिन्न स्थानों से पधारे विभिन्न विधाओं के कवियों ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं की तालियां बटोरीं। कार्यक्रम का संचालन कर रहे अनपरा, सोनभद्र से पधारे राष्ट्रवादी कवि कमलेश राजहंस ने कहा-
“इस मुल्क की तबाही कितना करोगे और क्या है तुम्हारे दिल में बता क्यों नहीं देते जम्हूरियत की लाश को कंधे पे उठाकर, गांधी की समाधि पे चढ़ा क्यों नहीं देते” उज्जैन के गीत सम्राट कैलाश ‘तरल’ ने निम्न पंक्तियों के माध्यम से श्रोताओं का दिल जीता-

“ये देश राम का राम की धरती
मंदिर क्यों ना हो राम का
एक है दिल लो यह सच मानो
दिल की धड़कन दूजा है
राम लला को गांव-गांव में
मुस्लिम तक ने पूजा है
झूठा आरोप लगा मत देना
कहीं किसी के नाम का
यह देश राम का राम की धरती
मंदिर क्यों ना हो राम का”
कानपुर के व्यंग्यकार डॉ सुरेश अवस्थी ने अपने प्रभावशाली व्यंग्यों के माध्यम से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। उन्होंने कहा-
” हमको बनावटी लोगों के व्यवहार अच्छे नहीं लगते,
ईमान बिक गए जहां वह बाजार अच्छे नहीं लगते
यूं तो दुनिया की चकाचौंध सबको लुभाती है,
लेकिन घर में बुजुर्ग ना हों तो त्यौहार अच्छे नहीं लगते”
कोटा, राजस्थान से पधारे देवेंद्र वैष्णव ने अपनी हास्य रचनाओं के माध्यम से श्रोताओं को जी भरकर हंसाया। उन्होंने कहा-
“टीवी पर चल रहा था आधे कपड़ों में गाना,
बेटे ने कहा दूसरा चैनल तो लगाना
राजू तू सो जा बेटे यह गरीब लड़की है,
ज्यादा गरीब आए पापा मुझको जगाना”
कार्यक्रम के अध्यक्ष जौनपुर के व्यंग्यकार कवि सभाजीत द्विवेदी ‘प्रखर’ ने अपने अनेक व्यंग्यों के माध्यम से श्रोताओं का दिल जीता। उन्होंने कहा-
“शीश आदर्श का बोझ लादे हुए
पांव गन्तव्य की ओर बढ़ता रहा
मैं जहां से चला था वहीं रह गया
जबकि अविराम वर्षों से चलता रहा”
वाराणसी की श्रृंगार गीत की कवयित्री विभा शुक्ला ने अपनी रचना प्रस्तुत करते हुए कहा-
” चाहती हूं कि दिल में बिठा लूं तुम्हें
पास आओ गले से लगा लूं तुम्हें
होकर दीवानी तेरी बनूं राधिका
तुम कहो तो मैं मोहन बना लूं तुम्हें”
अमेठी से पधारी गीत व ग़ज़ल की कवयित्री संदल अफरोज ने कहा-
” मैं जब घर से निकलती हूं वफाएं साथ रहती हैं,
गमों की धूप में तेरी घटाएं साथ रहती हैं
जमाने की हवाओं से कभी संदल नहीं डरती
हिफाजत के लिए मां की दुआएं साथ रहती हैं”
शाहजहांपुर के स्थानीय कवि एवं गीतकार डॉ इंदु अजनबी ने कहा- “बहुत कठिन है मगर इतना काम कर देना
तपती इस दोपहर को मधुर शाम कर देना
मैं उसमें प्रेम के स्वर पोर पोर भर दूंगा
बांसुरी तुम हो इसे मेरे नाम कर देना”
एस एस कॉलेज के कवि एवं गीतकार तथा कार्यक्रम के संयोजक डॉ शिशिर शुक्ला ने शहीदों के परिजनों को समर्पित करते हुए एक रचना प्रस्तुत की। उन्होंने कहा-
“तकती राहें करें प्रतीक्षा आंखों को समझाना है
बहुत दूर अब गया है बेटा वापस लौट न आना है
कर नमन तुम्हें और शीश झुका देखो भगवान भी रोया है
भारत की रक्षा की खातिर तुमने कितना कुछ खोया है”
कार्यक्रम के अंत में प्रमिला मित्तल ने आल्हा गायक शीलू सिंह राजपूत का सम्मान अंगवस्त्र उड़ाकर किया। महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ आर के आजाद एवं उप प्राचार्य डॉ अनुराग अग्रवाल ने कवियों को माल्यार्पण कर एवं अंग वस्त्र भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम में बिट्ठल माहेश्वरी, अशोक अग्रवाल, रामचंद्र सिंघल, सुरेश सिंघल, प्रमोद प्रमिल, ईशपालसिंह, जयशंकर ओझा, ओम सिंह, फिरोज हसन खान, अरविन्द सिंह, डा के के शुक्ला, संजीव गुप्ता, डॉ अमीर सिंह यादव, डॉ आलोक कुमार सिंह, डॉ कमलेश बाबू गौतम, श्री रामनिवास गुप्ता, डा बरखा सक्सेना, डॉ कविता भटनागर, डॉ प्रतिभा सक्सेना आदि उपस्थित रहे।













































































