खतरा कहीं और, सुरक्षा की गुहार बदायूं में… क्या 2027 से पहले डीपी यादव फिर टटोल रहे अपनी सियासी जमीन?
बदायूं। करीब एक माह पहले पूर्व सांसद एवं पूर्व मंत्री डीपी यादव ने बदायूं में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी और अपनी पत्नी पूर्व विधायक उमलेश यादव की जान को खतरा बताते हुए प्रशासन से सुरक्षा की मांग की थी। उस समय यह घटनाक्रम खबर बना और डीपी यादव की मांग को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया। उन्होंने अपनी और पत्नी की सुरक्षा के लिए गनर उपलब्ध कराने की मांग की थी और सुरक्षा पर होने वाला निर्धारित खर्च स्वयं वहन करने की बात भी कही थी। अब जब उस प्रेस कॉन्फ्रेंस को करीब एक माह बीत चुका है, तो इस पूरे घटनाक्रम को एक नए नजरिये से देखने पर सवाल सुरक्षा से आगे बढ़कर सियासत तक पहुंचता है—आखिर सुरक्षा की मांग के लिए बदायूं ही क्यों?डीपी यादव ने प्रशासन को दिए पत्र में अपने और परिवार के लिए खतरे की आशंका जताते हुए सुरक्षा बढ़ाने की मांग की थी। उन्होंने परिवार में पहले हुई हत्याओं का भी उल्लेख किया था। उनका कहना था कि मौजूदा परिस्थितियों में उनके और परिवार के साथ कोई गंभीर घटना हो सकती है। सुरक्षा मांगने के पीछे उनका तर्क अपनी जगह गंभीर है और यदि किसी व्यक्ति को वास्तविक खतरा है तो प्रशासन का दायित्व है कि उपलब्ध सुरक्षा इनपुट के आधार पर उसका आकलन करे और आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध कराए।
लेकिन राजनीतिक नजरिये से देखें तो इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प सवाल “बदायूं ही क्यों?” बनकर सामने आता है।
डीपी यादव का आज का सामाजिक और पारिवारिक जीवन केवल बदायूं तक सीमित नहीं है। नोएडा और गाजियाबाद से उनका पुराना और गहरा संबंध रहा है। वर्ष 2024 में भी उनकी जान को खतरे से जुड़ा मामला सामने आया था, जिसमें सुरक्षा को लेकर दिल्ली और उत्तर प्रदेश के अधिकारियों के स्तर पर मामला उठाए जाने की खबरें आई थीं। ऐसे में स्वाभाविक सवाल है कि यदि खतरे की आशंका व्यापक है तो बदायूं के जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को ही सुरक्षा के मामले में सार्वजनिक रूप से सामने लाने की जरूरत क्यों महसूस हुई?इस सवाल का कोई आधिकारिक जवाब सामने नहीं आया है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि इसके पीछे निश्चित रूप से कोई चुनावी रणनीति है। लेकिन राजनीति में समय और स्थान दोनों का अपना महत्व होता है। खासकर तब, जब उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों की आहट तेज हो चुकी हो और पुराने राजनीतिक चेहरे अपने पुराने प्रभाव वाले इलाकों में फिर चर्चा में आने लगें।डीपी यादव का बदायूं से रिश्ता भी साधारण राजनीतिक रिश्ता नहीं रहा है। वर्ष 2007 में डीपी यादव सहसवान विधानसभा सीट से विधायक बने थे, जबकि उनकी पत्नी उमलेश यादव बिसौली विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुनी गई थीं। यानी एक समय बदायूं की दो महत्वपूर्ण विधानसभा सीटों पर एक ही राजनीतिक परिवार का प्रभाव था। यही वह दौर था जब डीपी यादव की बदायूं की राजनीति में मजबूत पकड़ मानी जाती थी।समय बदला, राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और डीपी यादव का प्रभाव भी पहले जैसा नहीं रहा। लेकिन बदायूं से उनका राजनीतिक अध्याय पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। सहसवान और बिसौली की राजनीति में उनके परिवार का नाम समय-समय पर चर्चा में आता रहा है। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी डीपी यादव परिवार की राजनीतिक सक्रियता सामने आई थी। यही वजह है कि बदायूं में उनकी किसी भी नई राजनीतिक गतिविधि को केवल सामान्य सामाजिक गतिविधि मानकर नजरअंदाज करना आसान नहीं है।अब सवाल यह नहीं कि डीपी यादव को सुरक्षा मिलनी चाहिए या नहीं। यदि खतरा है तो सुरक्षा मिलनी चाहिए और यह प्रशासनिक प्रक्रिया का विषय है। असली राजनीतिक सवाल यह है कि एक माह पहले सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दे को लेकर बदायूं में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के पीछे केवल प्रशासनिक मजबूरी थी या इसके साथ कोई राजनीतिक संदेश भी गया?
क्योंकि 2027 का चुनावी माहौल धीरे-धीरे आकार ले रहा है। विधानसभा क्षेत्रों में संभावित उम्मीदवारों की चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं। राजनीतिक दल पुराने समीकरणों और प्रभावशाली चेहरों को भी नए सिरे से आंक रहे हैं। ऐसे में कोई पुराना राजनीतिक चेहरा अपने पुराने प्रभाव वाले इलाके में अचानक सक्रिय दिखाई दे तो राजनीतिक विश्लेषक उसके हर कदम को स्वाभाविक रूप से चुनावी नजरिये से भी देखते हैं।हालांकि डीपी यादव ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनाव लड़ने या बदायूं की राजनीति में वापसी की कोई घोषणा नहीं की थी। इसलिए सुरक्षा की मांग को सीधे 2027 की चुनावी रणनीति कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन राजनीति में हर संकेत घोषणा के रूप में सामने नहीं आता। कभी-कभी सार्वजनिक रूप से उठाया गया कोई मुद्दा भी पुराने राजनीतिक संपर्कों और समर्थकों को सक्रिय करने का अवसर बन जाता है।यही कारण है कि बदायूं में डीपी यादव की सुरक्षा मांग अब एक अलग सवाल खड़ा कर रही है। क्या यह सिर्फ सुरक्षा का मामला है या बदायूं की पुरानी सियासी जमीन का तापमान भी नापा जा रहा है?
अगर आने वाले दिनों में डीपी यादव बदायूं में अपनी मौजूदगी बढ़ाते हैं, पुराने समर्थकों से संपर्क करते हैं, सहसवान-बिसौली में राजनीतिक गतिविधियां तेज होती हैं या परिवार का कोई सदस्य फिर सक्रिय भूमिका में दिखाई देता है, तब आज की सुरक्षा मांग को नए संदर्भ में पढ़ा जा सकता है। तब यह माना जा सकता है कि बदायूं में उनका आना केवल प्रशासनिक जरूरत नहीं था।
फिलहाल तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। एक तरफ डीपी यादव की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता है, दूसरी तरफ बदायूं से उनका पुराना राजनीतिक रिश्ता और 2027 का नजदीक आता चुनावी माहौल है। इन दोनों तथ्यों के बीच जो सवाल खड़ा होता है, उसका जवाब आने वाला समय ही देगा।क्या डीपी यादव बदायूं में सुरक्षा मांगने आए थे, या बदायूं को एक बार फिर यह याद दिलाने कि इस पुराने सियासी किले से उनका रिश्ता अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ?सुरक्षा की मांग पुरानी है, लेकिन सवाल नया है—2027 से पहले बदायूं में डीपी यादव की अगली रदनीति क्या होगी? सभी को बेतवी से इंतजार है।
















































































