रुपया नहीं, रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं को दें अहमियत
बरेली। एसआरएमएस रिद्धिमा में मणिमधुकर लिखित हास्य व्यंग से भरपूर नाटक ‘दुलारी बाई’ का मंचन हुआ। विनायक कुमार श्रीवास्तव निर्देशित यह नाटक धन-लोलुपता, स्वार्थ और सामाजिक विडम्बनाओं पर गहरी चोट करता है। इसकी केंद्रीय पात्र दुलारी बाई अपने कंजूस और स्वार्थी स्वभाव के कारण अनेक हास्यास्पद परिस्थितियों में उलझती है। ये परिस्थितियां दर्शकों का मनोरंजन करने के साथ समाज में मानवीय मूल्यों के क्षरण पर सोचने के लिए प्रेरित करती हैं और नाटक धन से अधिक महत्वपूर्ण मानवीय संवेदनाओं और रिश्तों का संदेश देता है। कल्लू भांड और दुलारी बाई के चुटीले संवाद से नाटक आरंभ होता है। कल्लू दुलारी बाई को उसकी कंजूसी और उसके पास रखे रुपये के बारे में बात करके परेशान करता है।एक दिन गांव का एक आदमी कटोरीमल आता है। वो अपने खुद को इत्र का सौदागर बताता है और बीकानेर की महारानी के लिए इत्र का सौदे करने के लिए दुलारी बाई की मदद मांगती है। वह कहता है कि दुलारी बाई उस सौदे को कर ले और अपने कमीशन के लिए कह कर इत्र की शीशी दुलारी बाई को देकर चला जाता है । गांव का ही एक लड़का नानकु मोची भी दुलारी बाई को छेड़ता रहता और मस्ती में उलटी सीधी शायरी सुनता है, जिससे लोगों को हंसी आती है। एक दिन दुलरी के घर कल्लू भांड साधु बन कर आता है और उसे बातों में फंसा कर उससे दलिया बनाने को करता है। कंजूस दुलारी बाई से ही सारा सामान जैसे चावल घी इत्यादि मंगा कर वह दलिया बनाता और खिलाता है। जाते जाते उसे उसके पुराने और फटे जूते फेंकने के लिए कहता है । कहता है इसी जूते की वजह से उसका भाग्य ठीक नहीं चल रहा है। वह जूते फेंक देगी तो एक दिन एक राजा आएगा और उसी से दुलारी बाई की शादी होगी। अब दुलारी बाई उस जूते को बनवाने नानकु मोची के पास जाती है। रास्ते में मंदिर में रुक कर दर्शन करती है। वहीँ पर गांव का पटेल भी गंगाराम के साथ आता है। दुलारी बाई अपने फटे पुराने जूते छोड़ कर पटेल के नए जूते उठा ले जाती है। अपने जूते न पाकर पटेल नाराज होता है। तभी गंगाराम वहां पड़े दुलारी बाई के पुराने जूते पहचान कर उसे घोटने लगता है। वह दुलारी बाई को लेकर पटेल के पास जाता है। पटेल दुलारी बाई को धमकाता है और सौ रूपये का जुर्माना पंचायत में जमा करने को कहता है। यह सुनकर दुलारी बाई को साधु की बात ठीक लगती है। वह रात में अपने जूते लेकर जमीन में दबाने जाती है। जहां फर्जी लाल उसे चोर समझ कर हल्ला मचाता है। दुलारी बाई को फिर से पटेल के घर ले जाया जाता है। अब पटेल दुलारी बाई को दो हजार रूपये जुर्माना डाल देता है। अब दुलारी बाई डर जाती है और अपने जूते घर की खिड़की से बाहर फेंक देती है। वो जूते बाहर सड़क पर खड़े फर्जी लाल के माथे पर लगते हैं। फर्जी लाल कंजूस दुलारी बाई से चोट लगने का हर्जाना मांगता है। एक दिन पटेल को एक राजा अपने यहां बुलाता है और पटेल से कहता है कि वो हमारी शादी दुलारी बाई करा दे और कन्या दान करे। पटेल और गांव के लोग राजा के साथ दुलारी बाई की शादी करवा देते है। शादी के बाद दुलारी को पता चलता है कि वो राजा नहीं कल्लू भांड है, तब दुलारी बाई बहुत ज़्यादा भड़क जाती है। दोनों लड़ कर उसी पेड़ के नीचे सो जाते हैं। तभी दुलारी बाई सपना देखती है कि भगवान उसे दर्शन देते है। दुलारी बाई भगवान से वरदान मांगती है कि वो जिसको भी छुए वो सोने का बन जाये। भगवान तथास्तु कह कर चले जाते हैं। तब दुलारी जिसको भी छूती है वो सोने का हो जाता है। कल्लू भांड सहित गांव के कई लोग सोने के हो जाते हैं। पेड़, मिठाई खाना सब सोने का हो जाता है। घबरा कर दुलारी बाई की नींद खुलती है वह कल्लू को जगती है । उसे लगता है कि शादी के बाद उसे कल्लू के साथ ही रहना चाहिए। नाटक यहीं पर समाप्त हो जाता है। नाटक में दुलारी बाई की भूमिका विषा गंगवार और कल्लू भांड की भूमिका सूर्य प्रकाश ने निभाई। कटोरीमल का किरदार नाटक के निर्देशक विनायक कुमार श्रीवास्तव ने खुद निभाया। हिरदयांश उपाध्याय (ननकु मोची), राज किशोर पाठक (पटेल), निशांत कुमार (फर्जी लाल), हर्ष यादव (गंगा राम), प्रथम शर्मा (ईश्वर) ने भी अपने पात्रों को जीवंत किया। दीपकांत जोहरी (तबला) और अनुग्रह सिंह (की बोर्ड) ने भी अपने वाद्ययंत्रों के साथ नाटक में उपस्थिति दर्ज कराई। दुलारी बाई में साउंड का संचालन अरुण सैनी और ज़ाफ़र एवं प्रकश संचालन जसवंत ने दिया। इस अवसर पर एसआरएमएस ट्रस्ट के संस्थापक एवं चेयरमैन देव मूर्ति , आदित्य मूर्ति , आशा मूर्ति , ऋचा मूर्ति , देविशा मूर्ति , उषा गुप्ता, सुभाष मेहरा, डा.एमएस बुटोला, डा.प्रभाकर गुप्ता, डा.अनुज कुमार, डा.शैलेश सक्सेना, डा.रीता शर्मा सहित शहर के गणमान्य संगीत प्रेमी मौजूद रहे।















































































