“जो तुम्हें गाली दे, तुम उसे दुआ दो; पाप से घृणा करो, पापी से नहीं” — आचार्य संजीव रूप
बिल्सी। तहसील क्षेत्र के यज्ञ तीर्थ गुधनी स्थित प्रज्ञा यज्ञ मंदिर में रविवार को आर्य समाज का साप्ताहिक सत्संग श्रद्धा एवं भक्ति के साथ आयोजित किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 51 मंत्रों के उच्चारण के साथ वैदिक यज्ञ द्वारा हुआ, जिसमें श्रद्धालुओं ने आहुति देकर विश्व कल्याण की कामना की।सत्संग में वैदिक विद्वान आचार्य संजीव रूप ने यज्ञ संपन्न कराते हुए उपस्थित श्रद्धालुओं को वेदों का संदेश सुनाया। उन्होंने कहा कि ईश्वर सभी प्राणियों पर समान रूप से कृपा करता है। वह धर्मात्मा और दुरात्मा, पापी और पुण्यात्मा सभी को जीवन, वायु, जल और सुख प्रदान करता है। इसलिए मनुष्य को भी पाप से घृणा करनी चाहिए, पापी से नहीं।
उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति आपको अपशब्द कहे या आपके साथ बुरा व्यवहार करे तो उसके बदले में बुराई का उत्तर बुराई से नहीं देना चाहिए। यदि संभव हो तो उसे दुआ दें, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों का स्वयं उत्तरदायी होता है। जैसा कर्म करेगा, वैसा ही फल उसे अवश्य मिलेगा। संसार में कोई भी व्यक्ति अपने कर्मों के फल से बच नहीं सकता।आचार्य संजीव रूप ने भगवान श्रीकृष्ण के कर्मयोग का संदेश सुनाते हुए कहा कि मनुष्य को बिना फल की इच्छा किए अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि “कर्म किए जा, फल की इच्छा मत कर रे इंसान; जैसा कर्म करेगा, वैसा फल देगा भगवान” का संदेश आज भी मानव जीवन के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।सत्संग के दौरान कुमारी कौशिकी आर्य ने प्रेरणादायक भजन “जब तक जग में शुभ कर्मों का संचित सामान नहीं होगा, तब तक भव पार उतरने का पूरा अरमान नहीं होगा” प्रस्तुत किया। भजन सुनकर पूरा वातावरण भक्तिमय और आध्यात्मिक भावनाओं से सराबोर हो गया।कार्यक्रम में राकेश आर्य, श्रीमती लीलावती, श्रीमती सूरजवती देवी, श्रीमती कमलेश कुमारी, श्रीमती मुन्नी देवी, श्रीमती सरोज देवी, बद्री प्रसाद आर्य सहित आर्य संस्कार शाला के बच्चों ने भी सहभागिता कर वैदिक संस्कृति एवं संस्कारों के प्रचार-प्रसार का संकल्प लिया। सत्संग का समापन शांति पाठ एवं प्रसाद वितरण के साथ हुआ।















































































