बरेली। प्राचीन बाबा त्रिवटी नाथ मंदिर के श्री रामालय में चल रही श्रीरामचरितमानस कथा के नवम दिवस कथा व्यास पंडित प्रभाकर त्रिपाठी ने सीता-राम विवाह के आध्यात्मिक स्वरूप का विस्तृत वर्णन किया। उन्होंने कहा कि मिथिलापुरी माता सीता के रूप में और अवधपुरी प्रभु श्रीराम के रूप में एक-दूसरे का श्रृंगार एवं आधार हैं। दोनों के मिलन से ही सृष्टि की पूर्णता संभव होती है। कथा व्यास ने कहा कि प्रभु श्रीराम ज्ञान स्वरूप हैं, जबकि माता सीता भक्ति स्वरूपा हैं। ज्ञान और भक्ति का संगम ही मनुष्य के जीवन में विनम्रता लाता है। केवल ज्ञान अभिमान को जन्म देता है, जबकि ज्ञान के बिना भक्ति आडंबर और ढोंग का रूप ले सकती है। उन्होंने सीता-राम विवाह को मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार के चार प्रकार के समर्पण का प्रतीक बताया। फुलवारी में सीता जी द्वारा राम को मन से स्वीकार करना मन का समर्पण, जनक की प्रतिज्ञा पूर्ण होना बुद्धि का समर्पण, वरमाला पहनाना चित्त का समर्पण तथा धनुष भंग के बाद जनक द्वारा सीता को राम को समर्पित करना अहंकार के त्याग का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि प्रभु प्राप्ति के लिए मनुष्य को मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार चारों का समर्पण करना आवश्यक है। कथा विश्राम के बाद मंदिर सेवा समिति के प्रताप चंद्र सेठ और मीडिया प्रभारी संजीव औतार अग्रवाल ने कथा व्यास का अभिनंदन किया। संजीव औतार अग्रवाल ने बताया कि पं. प्रभाकर त्रिपाठी पिछले 33 वर्षों से निरंतर मंदिर प्रांगण में श्रीराम कथा का अमृतपान करा रहे हैं। कथा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने आरती कर प्रसाद ग्रहण किया। कार्यक्रम में प्रताप चंद्र सेठ, संजीव औतार अग्रवाल और सुभाष मेहरा का विशेष सहयोग रहा।