कृषि, किसान और ग्रामीण भारत की आवाज़ को राष्ट्रीय-सम्मान,

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कोंडागांव/कोलकाता। हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पूर्ण होने के ऐतिहासिक अवसर पर भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता तथा प्रतिष्ठित साहित्यिक शोध पत्रिका पैरोकार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “हिंदी पत्रकारिता द्विशताब्दी समारोह (1826-2026)” एवं राष्ट्रीय संगोष्ठी अत्यंत भव्य, गरिमामय और ऐतिहासिक वातावरण में संपन्न हुई। देशभर से आए साहित्यकारों, पत्रकारों, संपादकों, शोधार्थियों, शिक्षाविदों तथा बुद्धिजीवियों की उल्लेखनीय उपस्थिति के कारण भारतीय भाषा परिषद का सभागार पूरे कार्यक्रम के दौरान श्रोताओं से खचाखच भरा रहा।
“द्वि-शताब्दी हिंदी पत्रकारिता और बंगीय विरासत” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता बस्तर के प्रख्यात साहित्यकार, चिंतक, वरिष्ठ पत्रकार, जनजातीय सरोकारों के संवाहक तथा राष्ट्रीय मासिक पत्रिका ककसाड़ के संपादक डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने तथा अध्यक्षता की। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार एवं छपते-छपते के संपादक श्री विश्वम्भर नेवर थे।
इस अवसर पर भारतीय भाषा परिषद और पैरोकार द्वारा डॉ. राजाराम त्रिपाठी को “पैरोकार ग्रामीण पत्रकारिता शिखर सम्मान” से अलंकृत किया गया तथा अभिनंदन पत्र प्रदान किया गया। यह सम्मान उन्हें कृषि, किसान, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जनजातीय जीवन तथा सामाजिक सरोकारों पर तीन दशकों से अधिक समय से किए जा रहे सतत लेखन, वैचारिक हस्तक्षेप और जनपक्षधर पत्रकारिता के लिए प्रदान किया गया। देश के विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं तथा राष्ट्रीय मंचों पर उनके लेख, संपादकीय और विचार लंबे समय से ग्रामीण भारत की समस्याओं, संभावनाओं और विकास के प्रश्नों को प्रमुखता से उठाते रहे हैं।
सम्मान ग्रहण करते हुए डॉ. त्रिपाठी ने इसे बस्तर के आदिवासी समाज और बस्तर व छत्तीसगढ़ के पत्रकार समुदाय को समर्पित करते हुए कहा कि जीवन में जो कुछ भी उन्होंने सीखा है, उसमें जनजातीय समाज की जीवन-दृष्टि, प्रकृति के प्रति सम्मान, सामुदायिक चेतना और मानवीय संवेदना का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है।अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने कहा कि यह भारतीय भाषाओं और सांस्कृतिक एकता का अद्भुत उदाहरण है कि हिंदी का प्रथम समाचार पत्र “उदंत मार्तंड” किसी हिंदी भाषी प्रदेश से नहीं, बल्कि कोलकाता की धरती से 30 मई 1826 को प्रकाशित हुआ था। उन्होंने कहा कि भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पुनर्जागरण में पत्रकारिता और साहित्य की निर्णायक भूमिका रही है तथा भविष्य में भी समाज को दिशा देने की सबसे बड़ी आशा इन्हीं दोनों क्षेत्रों से है।
उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि देश की कृषि, किसानों और ग्रामीण जीवन को पत्रकारिता तथा साहित्य में वह स्थान नहीं मिल पाया है जिसके वे वास्तविक रूप से अधिकारी हैं। प्रेमचंद के गोदान का होरी आज भी जिंदा है, और कर्ज में जकड़ा हुआ है। भारत की आत्मा गांवों, किसानों और श्रमशील समाज में बसती है, इसलिए पत्रकारिता और साहित्य को ग्रामीण भारत, कृषि और जनजातीय जीवन की चुनौतियों तथा उपलब्धियों को अधिक गंभीरता से राष्ट्रीय विमर्श में स्थान देना होगा।
इस अवसर पर भारतीय भाषा परिषद के निदेशक, सुप्रसिद्ध साहित्यकार तथा वागर्थ के संपादक डॉ. शंभुनाथ ने बीज वक्तव्य देते हुए कहा, “पहले न्यूज़ से न्यूज़ निकलता था, आज व्यूज़ से न्यूज़ निकाला जा रहा है। पत्रकारिता केवल सूचना देना नहीं, बल्कि समाजहित में आवश्यक सत्य को सामने लाने का दायित्व है।” उनके इस विचारोत्तेजक वक्तव्य को उपस्थित साहित्यकारों और पत्रकारों ने विशेष सराहना के साथ सुना।
राष्ट्रीय संगोष्ठी में विशिष्ट अतिथियों राज मंगोलिया, शकुन त्रिवेदी, जितेन्द्र जितांशु, संतोष सिंह, शाहनवाज अख्तर तथा रेशमी पांडा मुखर्जी के द्वारा भी अपने विचार व्यक्त किए और हिंदी पत्रकारिता की दो शताब्दियों की यात्रा, उसकी चुनौतियों तथा भविष्य की संभावनाओं पर महत्वपूर्ण वक्तव्य दिए। कार्यक्रम का प्रभावशाली संचालन डॉ. अभिज्ञात ने किया।
समारोह में वरिष्ठ साहित्यकार श्री संतन कुमार पाण्डेय को “पैरोकार लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड” तथा श्री गंगा प्रसाद को “पैरोकार पत्रकारिता शिखर सम्मान” प्रदान किया गया।
इस राष्ट्रीय आयोजन के सफल संयोजन और संचालन में पैरोकार के प्रधान संपादक अनवर हुसैन , विमल शर्मा तथा उनकी पूरी टीम की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिसकी उपस्थित अतिथियों और प्रतिभागियों ने मुक्त कंठ से सराहना की।
उल्लेखनीय है कि डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने अपनी पत्रकारिता 43 वर्ष पूर्व ‘बस्तर-टुडे’ साप्ताहिक समाचार पत्र से शुरू की थी तथा विगत बारह वर्षों से जनजातीय सरोकारों की राष्ट्रीय मासिक पत्रिका ककसाड़ का संपादन कर रहे हैं। उनकी चर्चित कृति “मैं बस्तर बोल रहा हूं” ने देशभर में व्यापक चर्चा अर्जित की। इस कृति का अंग्रेजी अनुवाद “Yes, Bastar is Speaking” तथा मराठी अनुवाद “मी आदिवासी बोलतोय” भी प्रकाशित होकर विशेष रूप से चर्चित रहे हैं। उनके संपादकीय लेखों का संग्रह “दुनिया इन दिनों” तथा हाल ही में प्रकाशित शोधग्रंथ “गांडा : अनुसूचित जाति या जनजाति?” भी बौद्धिक जगत में गंभीर विमर्श का विषय बने हुए हैं।
साहित्य और पत्रकारिता के साथ-साथ डॉ. त्रिपाठी ने जैविक कृषि, पर्यावरण संरक्षण, जनजातीय उत्थान, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि नवाचार के क्षेत्र में भी विशिष्ट पहचान बनाई है। किसानों के सशक्तिकरण, आदिवासी आजीविका संवर्धन तथा कृषि आधारित नवाचारों के क्षेत्र में उनके योगदान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है।
साहित्यिक और पत्रकारिता जगत के जानकारों का मानना है कि हिंदी पत्रकारिता की द्विशताब्दी जैसे ऐतिहासिक अवसर पर डॉ. राजाराम त्रिपाठी को राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता का दायित्व सौंपा जाना तथा ग्रामीण पत्रकारिता के लिए राष्ट्रीय सम्मान से अलंकृत किया जाना केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं है, बल्कि उस वैचारिक परंपरा का सम्मान है जो खेत, किसान, गांव, जनजातीय समाज और भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाने का सतत प्रयास करती रही है।
यह सम्मान बस्तर की उस साहित्यिक चेतना, जनजातीय संवेदना और जनपक्षधर पत्रकारिता का भी राष्ट्रीय अभिनंदन है जिसने वर्षों से भारतीय समाज को नई दृष्टि, नई ऊर्जा और नई दिशा प्रदान की है।

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