शिवभक्त, राजनीतिज्ञ, संगीतज्ञ और धर्मशास्त्रों का ज्ञाता भी था रावण
बरेली। एसआरएमएस रिद्धिमा में रविवार को डॉ. प्रभाकर गुप्ता लिखित कहानी एवं अश्वनी कुमार द्वारा नाट्य रूपांतरित ‘पौलस्त्य’ का मंचन हुआ। विनायक कुमार श्रीवास्तव निर्देशित इस नाटक में भारतीय पौराणिक कथाओं के जटिल और बहुपक्षीय पात्रों में से एक पौलस्त्य (रावण) के जीवन के अनदेखे आयामों को उजागर करते हुए मंचन किया गया, जिसमें रावण को शिवभक्त, विद्वान, राजनीतिज्ञ, संगीतज्ञ और धर्मशास्त्रों के ज्ञाता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। नाटक का आरंभ इक्ष्वाकु वंश के एक राजा अनरण्य और युवा रावण यानि दसग्रीव के द्वंद्व युद्ध से होता है। दसग्रीव अनरण्य को तो पराजित करता ही है साथ में उसके इक्ष्वाकु कुल का भी अपमान करता है। इससे नाराज अनरण्य दसग्रीव को शाप देता है कि हमारे इक्ष्वाकु कुल में पैदा वीर ही तुम्हारा अंत करेगा। कुछ समय बीतने के बात युवा दसग्रीव रावण के रूप आता है। रावण को अनरण्य द्वारा दिया गया शाप याद आता है कि कही राम उसी का हेतु बन कर तो नहीं आया है। दूसरी तरफ राम ने सागर तट पर सीता वापस लाने के लिए सेतु का निर्माण किया है उसके लिए शिवलिंग स्थापित किया है। उस शिवलिंग की स्थापना पूजन के लिए राम चिंतित होते है। इस नाटक का एक अत्यंत रोचक प्रसंग वह है, जब भगवान राम द्वारा स्थापित शिवलिंग की पूजा के लिए स्वयं रावण को पुरोहित के रूप में आमंत्रित किया जाता है, जहाँ वह शत्रुता से ऊपर उठकर अपने ब्राह्मण धर्म का निर्वहन करता है। यह प्रसंग दर्शाता है कि धर्म और कर्तव्य, वैर से भी ऊपर हो सकते हैं। किन्तु ये पूजन बिना पत्नी के संभव नहीं हो सकता। इसलिए रावण सीता को पूजन में ले आता है और यज्ञ के बाद उसको वापस लंका ले आता है, क्योंकि रावण को पता है कि नियति को पूर्ण करने के राम को युद्ध के लिए लंका आना ही होगा। रावण पुरोहित के रूप में राम को लंका विजय का भी आशीर्वाद देता है। इसके बाद रावण युद्ध के लिए जाता है। मंदोदरी रावण को युद्ध में जाने से रोकती है, लेकिन रावण जाता है और राम द्वारा मारा जाता है। उसकी मृत्यु से पूर्व राम लक्ष्मण को रावण से ज्ञान और उसकी राजनीतिक कुशलता की शिक्षा के लिए भेजते हैं। रावण कहता है कि शत्रु हमेशा मित्र से श्रेष्ठ होना चाहिए, क्योंकि संसार हम सब का मूल्यांकन मित्र से नहीं शत्रु की ऊंचाई से करता है। रावण लक्ष्मण को बोलता है कि अपने जीवन के रहस्यों को हमेशा गुप्त रखना क्योंकि उसके छोटे भाई विभीषण को उसकी मृत्यु का गूढ़ रहस्य मालूम था। वही उसकी मृत्यु का कारण बना। अंत में रावण भगवान शिव और भगवान राम को स्मरण करते हुए प्राण त्याग देता है। इस नाट्य प्रस्तुति का उद्देश्य किसी भी धार्मिक भावना को आहत करना नहीं, बल्कि दर्शकों को यह समझाना है कि इतिहास और पौराणिक पात्रों को केवल एक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि तटस्थ और अध्ययनशील दृष्टि से देखना चाहिए। नाटक में रावण की भूमिका विनायक श्रीवास्तव और राम की भूमिका गौरव कार्की ने निभाई। लक्षमण के रूप में मानेश यादव और सीता के रूप में अदिति भारद्वाज दर्शकों के सामने आए। हर्ष यादव (अनरण्य) शिवम् यादव (जामवंत), भूपेश (हनुमान), निशांत (सुग्रीव), शिवा शर्मा (दसग्रीव और विभीषण),और हिरदयांश (सैनिक) ने भी अभिनय से प्रभावित किया। नाटक में दीपकांत जौहरी (तबले), सूर्यकान्त चौधरी (वायलिन), अनुग्रह सिंह (की-बोर्ड) ने भी अपने वाद्ययंत्रों के साथ नाटक में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। साउंड संचालन अरुण सैनी और जफर ने और प्रकाश संचालन की जिम्मेदारी जसवंत सिंह ने निभाई। इस अवसर पर एसआरएमएस ट्रस्ट के संस्थापक एवं चेयरमैन देव मूर्ति जी, आशा मूर्ति , आदित्य मूर्ति , ऋचा मूर्ति , देविशा मूर्ति, उषा गुप्ता, डा. रजनी अग्रवाल, डा. प्रभाकर गुप्ता, डा. शैलेश सक्सेना, डा. रीता शर्मा और शहर के गणमान्य लोग मौजूद रहे।















































































