ब्रेस्ट कैंसर और महिलाओं की सेहत, जागरूकता और समय पर पहचान है बेहद ज़रूरी
बरेली। महिलाओं की सेहत पर अक्सर अलग-अलग हिस्सों में बात होती है कहीं फर्टिलिटी, कहीं हार्मोन, तो कहीं उम्र बढ़ने से जुड़ी समस्याएं। लेकिन असल में इसका मूल उद्देश्य है एक ऐसी ज़िंदगी जीना जो सम्मान, आत्मविश्वास और मजबूती से भरी हो। इसी संदर्भ में ब्रेस्ट कैंसर एक बेहद अहम और गंभीर विषय बनकर सामने आता है। यह सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि लाखों महिलाओं और उनके परिवारों की वास्तविकता है।
भारत समेत दुनियाभर में यह महिलाओं में सबसे ज्यादा पाए जाने वाले कैंसर में से एक है, जो हर वर्ग, क्षेत्र और पृष्ठभूमि को प्रभावित करता है। हर एक डायग्नोसिस के पीछे एक महिला होती है, जो अपने शरीर, पहचान और भविष्य से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों का सामना कर रही होती है। इसलिए महिलाओं की सेहत पर कोई भी सार्थक चर्चा ब्रेस्ट कैंसर को स्पष्टता, वैज्ञानिक समझ और गंभीरता के साथ शामिल किए बिना अधूरी है।
मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, नोएडा के ब्रेस्ट सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग की सीनियर डायरेक्टर एवं यूनिट हेड डॉ. (प्रोफेसर) नवनीत कौर ने बताया “ब्रेस्ट कैंसर तब होता है जब स्तन (ब्रेस्ट) की कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं और एक मैलिग्नेंट ट्यूमर बना देती हैं। ये असामान्य कोशिकाएं ब्रेस्ट के डक्ट्स (जिसे डक्टल कार्सिनोमा कहा जाता है) या लोब्यूल्स (लोब्यूलर कार्सिनोमा) से शुरू हो सकती हैं। अगर समय पर इलाज न हो, तो ये कैंसर आसपास के टिश्यू और शरीर के अन्य अंगों तक फैल सकता है। इसके जोखिम कई कारणों से जुड़े होते हैं, जैसे बढ़ती उम्र, जल्दी पीरियड्स शुरू होना, देर से मेनोपॉज, मोटापा, अल्कोहल का सेवन, कम शारीरिक गतिविधि और परिवार में कैंसर का इतिहास। इसके अलावा BRCA1 और BRCA2 जैसे जेनेटिक म्यूटेशन भी जोखिम को बढ़ाते हैं, हालांकि यह समझना जरूरी है कि अधिकांश महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर बिना किसी मजबूत पारिवारिक इतिहास के भी हो सकता है—इसलिए न तो लापरवाही सही है और न ही बेवजह डर।
समय पर पहचान (अर्ली डिटेक्शन) ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में सबसे बड़ा फर्क डालती है। शुरुआती स्टेज में पकड़े गए मामलों में इलाज के परिणाम कहीं बेहतर होते हैं। इसलिए नियमित स्क्रीनिंग बेहद जरूरी है। आमतौर पर 40 वर्ष से ऊपर की महिलाओं को डॉक्टर की सलाह के अनुसार मैमोग्राफी करवानी चाहिए, जबकि जिन महिलाओं के परिवार में कैंसर का इतिहास है, उन्हें पहले से ही जांच शुरू करने की जरूरत हो सकती है। इसके साथ ही सेल्फ-ब्रेस्ट एग्जामिनेशन भी उपयोगी है। महिलाओं को अपने ब्रेस्ट के सामान्य लुक और फील के बारे में जागरूक होना चाहिए। अगर कोई नया गांठ (लंप), निप्पल से डिस्चार्ज, त्वचा में गड्ढा पड़ना, लालिमा, लगातार दर्द या ब्रेस्ट के आकार में बदलाव नजर आए, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करवानी चाहिए।
डॉ. नवनीत ने आगे बताया “आज के समय में ब्रेस्ट कैंसर का इलाज काफी एडवांस हो चुका है। इलाज ट्यूमर के प्रकार, स्टेज और उसकी बायोलॉजिकल विशेषताओं पर निर्भर करता है। सर्जरी में लम्पेक्टॉमी (सिर्फ ट्यूमर हटाना) या मास्टेक्टॉमी (पूरे ब्रेस्ट को हटाना) शामिल हो सकता है। रेडियोथेरेपी लोकल स्तर पर कैंसर के दोबारा होने के खतरे को कम करती है, जबकि कीमोथेरेपी, हार्मोनल थेरेपी और टार्गेटेड थेरेपी शरीर में फैले कैंसर पर असर डालती हैं। आज पर्सनलाइज्ड मेडिसिन के जरिए इलाज को मरीज के रिसेप्टर स्टेटस—जैसे एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन और HER2—के आधार पर कस्टमाइज किया जा रहा है, जिससे बेहतर परिणाम मिल रहे हैं। ब्रेस्ट कैंसर केवल शारीरिक बीमारी नहीं है, बल्कि इसका मानसिक और सामाजिक प्रभाव भी गहरा होता है। शरीर की बनावट, यौनिकता, फर्टिलिटी और समाज में छवि को लेकर कई तरह की चिंताएं सामने आती हैं। ऐसे में काउंसलिंग, सपोर्ट ग्रुप्स और परिवार के साथ खुलकर बातचीत महिलाओं को मानसिक रूप से मजबूत बनाती है। सही इलाज के साथ-साथ भावनात्मक सहयोग भी उतना ही जरूरी है।“
हालांकि ब्रेस्ट कैंसर को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर इसके जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।














































































