श्रीरामकथा में कथा व्यास ने माता सीता की विदाई का प्रसंग सुनाया तो भक्तों के छलके आंसू

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शाहजहांपुर। मुमुक्षु आश्रम में चल रही श्रीराम कथा के समापन दिवस पर कथाव्यास विजय कौशल जी महाराज ने प्रभु श्रीराम के विवाह के प्रसंग को प्रारंभ किया। कथा व्यास ने कहा कि जब राम ने धनुष भंग कर दिया, तो स्वयंवर में मौजूद राजा महाराजा हाहाकार कर उठे। शिवधनुष भंग की घटना जानकर मलय पर्वत पर तपस्या कर रहे परशुराम दौड़े चले आए। उनके हाथ में चमचमाता हुआ फरसा एवं आंखों में भयंकर क्रोध था। माता सीता ने परशुराम जी को प्रणाम किया। जनक जी ने उनसे सीता स्वयंवर का प्रसंग कहा। विश्वामित्र जी के कहने पर राम और लक्ष्मण ने परशुराम जी को प्रणाम किया। परशुराम जी क्रोधित होकर पूरी सभा को ललकार कर बोले, “बताओ, शिव जी का यह धनुष किसने तोड़ा। सीता जी की मां परशुराम के अत्यंत क्रुद्ध होने पर मूर्छित होकर गिर पड़ी। राम ने आगे बढ़कर बड़ी ही विनम्रता से परशुराम जी को धनुष भंग के विषय में बताया। परशुराम धमकी देते हैं कि जिसने भी यह धनुष तोड़ा है, वह सामने आ जाए अन्यथा सभी राजा मारे जाएंगे। श्री राम विनम्रतापूर्वक कहते हैं कि धनुष तोड़ने वाला आपका ही कोई दास होगा। किंतु परशुराम का क्रोध शांत नहीं होता। लक्ष्मण जी ने परशुराम के क्रोध का उपहास करते हुए कहा कि बचपन में हमने बहुत सी धनुषियां तोड़ीं, तब तो आप इतना क्रोधित नहीं हुए। उन्होंने व्यंग्य किया कि यह तो धनुष छूते ही टूट गया इसमें रघुनाथ जी का क्या दोष। लक्ष्मण के कटाक्षों से क्रोधित परशुराम जब लक्ष्मण को मारने के लिए आगे बढ़े तब राम ने शांत भाव से बीच-बचाव किया और स्थिति को नियंत्रित किया, जिसके बाद परशुराम का क्रोध शांत हुआ। परशुराम ने भगवान राम के अवतार के रहस्य को जानकर उन्हें दंडवत प्रणाम किया और तपस्या करने चले गए। उधर राजा जनक ने राम और सीता के विवाह का शुभ संदेश अवधपुरी को भेजा है।
कथा व्यास ने कहा कि भगवान श्री राम जी के जैसा मधुर एवं शील स्वभाव किसी देवी देवता का नहीं।

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मधुर भजन की संगीतमयी प्रस्तुति से कथा पंडाल भक्ति भाव से सराबोर हो उठा।अवध नरेश राजा दशरथ विवाह का समाचार पाकर बारात तैयार करके जनकपुरी की ओर चल पड़े। जनकपुरी की शोभा देखकर वे परम प्रसन्न हुए। राजा जनक ने राम की बारात में आए सभी बारातियों का यथोचित स्वागत सत्कार किया।बारात में राम जी के साथ उनके तीनों भाई दूल्हा बनकर आए हैं। मिथिला की नारियां चारों को देखकर बड़ी ही प्रसन्न होती हैं और एक दूसरे से बातचीत करने लगती हैं और कहने लगती हैं –
आज मिथिला नगरिया निहाल सखिया चारो दूलहा में बड़का कमाल सखिया
राम की बारात में सभी देवी देवता ब्राह्मणों का वेश धर शामिल हो गए। कन्यादान की बात सुनकर जनक जी रोने लगे।
सिया रघुवर जी के संग पड़न लागीं भांवरिया। गीत की संगीमयी प्रस्तुति से कथा पंडाल में मौजूद श्रोता गण झूम उठे।राम-सीता विवाह के बाद मिथिला में ‘कोहवर’ (वर-वधू का मिलन/पूजा) और ‘जेवनार’ (भोज) की रस्में प्रमुखता से होती हैं। कोहवर में सीताजी रामजी को निहारती हैं, जिसे मिथिला में भावी जीवन का संदेश माना जाता है। जेवनार में सखियां रामजी की हंसी-ठिठोली के बीच पारंपरिक भोजन कराती हैं। विवाह के बाद सीता माता को जनक जी और माता सुनयना ने रोते-रोते डोली में बैठाया और बहुत समझा बुझाकर विदा किया।

मंच पर मुमुक्षु शिक्षा संकुल के मुख्य अधिष्ठाता स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती जी महाराज, महामंडलेश्वर श्री हरिहरानंद जी महाराज, अनंत श्री स्वामी अभेदानंद सरस्वती जी महाराज, अनंत श्री स्वामी विवेकानंद सरस्वती जी महाराज, अनंत श्री स्वामी सर्वेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज, अनंत श्री ज्योतिर्मयानंद सरस्वती जी महाराज एवं स्वामी गंगेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज उपस्थित रहे।

कथा प्रारंभ होने से पूर्व व्यासपीठ का पूजन मुख्य यजमान चंद्रभान त्रिपाठी एवं सुनीता त्रिपाठी ने किया। आरती एस.डी.एम. संजय कुमार पांडेय, नृपेंद्र सिंह एवं अर्चना सिंह, राम मोहन अग्रवाल एवं श्रीमती सुषमा अग्रवाल, अभिषेक अग्रवाल एवं श्रीमती मिली अग्रवाल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभाग प्रचारक श्री रवि प्रकाश जी ने की। प्रसाद वितरण श्री सुरेश सिंघल जी की तरफ से हुआ। कथा श्रवण हेतु प्रबंध समिति के सचिव प्रोफेसर अवनीश मिश्र, प्राचार्य प्रोफेसर आर के आजाद सहित मुमुक्षु शिक्षा संकुल की सभी शिक्षण संस्थाओं के समस्त शिक्षक व शिक्षणेत्तर कर्मचारियों सहित हजारों की संख्या में भक्तजन उपस्थित रहे।

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