केबी हिंदी सेवा न्यास की होली पर 115 वीं मासिक काव्य गोष्ठी में कवियों ने किया काव्य पाठ
बदायूं। के. बी. हिंदी सेवा न्यास की 115 वीं मासिक काव्य गोष्ठी न्यास के कार्यालय ‘बाबू कुटीर’ ब्रह्मपुरी में आयोजित की गई।गोष्ठी की अध्यक्षता नगर के उद्यमी व समाज सेवी संजय अग्रवाल द्वारा की गई। विशेष अतिथि हरस्वरूप शर्मा रहे, संचालन विजय कुमार सक्सेना ‘विजय’ ने किया।
शुभआरम्भ न्यास के अध्यक्ष डॉ.सतीश चन्द्र
शर्मा ‘सुधांशु’ एवं मंचासीन अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन व माँ वाणी को पुष्पार्पण से हुआ। वाणी वंदना डॉ.सुधांशु द्वारा की गई।
नरेंद्र’आभाषित’ ने सुनाया-
सांवरे नैना, बाबरे वैना छलके प्याली-प्याली है।
रंग में झूमे, अंग में झूमे
फाग उमंग निराली है।
रमेश चन्द्र मिश्रा ‘सहज’ ने कहा-
चित बसंत, चितवन बसंत
चितचोर बने घूमें हुरियारे।
संजय अग्रवाल ने सुनाया-
रंग ग़ुलाल हँसें होली के अवसर पर।
लग जाते हम काश गोरियों के मुख पर।
न्यास अध्यक्ष डॉ.सुधांशु ने सुनाया-
‘सुधांशु’ होली पे पहुँचे गाँव तो कुछ मित्र यूँ बोले-
गला तर कराने का करो कुछ उपकार होली में।
विजय सक्सेना ‘विजय’ ने कहा-
लाल हरे नीले सभी, कितने प्यारे रंग।
लगते हैं हुड़दंग में, सब गोरी के अंग।
राजीव कुमार उपाध्याय ने सुनाया-
हँसी ठिठोली ध्यान से, हो न जाए जंग।
जो लगबाए प्रेम से, उसे लगाओ रंग।
अशोक कुमार दुबे ने सुनाया-
सकारात्मक सोच से, होली खेलो मित्र।
भाईचारे प्रेम का,दिखे नवेला चित्र।
श्रीपाल शर्मा ‘शमन’ ने कहा –
होली खेलें चलो ब्रज की गलियाँ,
वनवारी वहीं पर मिलेंगे।
अक्षांश वत्सभार्गव ने सुनाया-
होली के दिन लगते अच्छे।
रंग से खेल रहे सब बच्चे।
रामकृपाल तिवारी ने कहा-
प्रेम लुटाती सब मन भाती
भूल पुरानी बातें सबको अपनाती
नवरस लायी होली है।
इसके अतिरिक्त हरस्वरूप शर्मा, रुद्रांश वत्सभार्गव, स्तुति, भक्ति आदि ने भी काव्य पाठ किया।न्यास अध्यक्ष डॉ. सुधांशु ने सभी कवियों को ‘नये क्षितिज’ पत्रिका के अंक 40-41 व 42-43 भेंट किए।
इस अवसर पर आशीष शर्मा, आशुतोष शर्मा, दिव्याँशु शंखधार, कल्पना, कुसुम लता आदी श्रोतागण उपस्थित रहे।
अध्यक्षीय उदवोधन के पश्चात गोष्ठी का समापन किया गया।













































































