छमाही उर्स ए शराफती व उर्स ए सकलैनी कुल शरीफ के साथ हुआ संपन्न
बरेली। मुताबिक़ 11 रमज़ान उल मुबारक दिन इतवार छमाही उर्स-ए-शराफती व उर्स ए सकलैनी के तीसरे व आख़िरी दिन की शुरुआत सुबह बाद नमाजे फज्र कुरआन ख्वानी से हुई। सुबह से ज़ायरीन की आमद बढ़ गई, देश के कई राज्यों व प्रदेश के विभिन्न शहरों, गाँव-कस्बों से पूरा दिन लोगों की आमद बनी रही। मज़ारे पाक पर हाजिरी के लिए मुरीदीन का तांता बंधा रहा, अकीदतमंद अपनी मोहब्बत ओ अकीदत के नजराने पेश करते रहे और अपनी मुरादें पाते रहे।
रमज़ान व उर्स के इस मुबारक मौके पर सज्जादानशीन का पैग़ाम खानकाह शरीफ के सज्जादानशीन फैजुल औलिया हज़रत शाह मोहम्मद ग़ाज़ी मियाँ हुज़ूर ने रमज़ान व उर्स के मुबारक मौके पर एक अहम पैग़ाम दिया कि रमज़ान शरीफ का महीना हमें सब्र, बर्दाश्त करना सिखाता है और बुरे कामों से रोकता है, आपस में एक दूसरे से मोहब्बत, ज़रुरतमंदो की मदद का जज़्बा बढ़ाता है, इसलिए हमें हर तरह सब्र, बर्दाश्त और आपस में एक दूसरे की मोहब्बत व मदद के जज़्बे के साथ ही पेश आना चाहिए, हम सब इस पाक माह में ज़ियादा से ज़ियादा इबादत करें और अपने रब को राजी करें, अल्लाह पाक हमारे मुल्क में शहर में घरों में अमन चैन और इंसानियत, भाईचारा क़ायम रहे, अल्लाह हम सब पर फजल फरमाये।
खानकाह शरीफ में बाद नमाज असर शाम 5:30 बजे कुल की फातिहा का एहतिमाम हुआ।
उर्स में शिरकत करने के लिए जायरीन देश के विभिन्न प्रदेशो गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार, मध्यप्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, राजस्थान, दिल्ली, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश एवं उत्तर प्रदेश के अधिकतर शहरों और गांव-कस्बों से जायरीन बरेली कुल में शिरकत करने आएं।
सभी मुरीदीन ने सज्जादानशीन से मिलकर दुनिया व आख़िरत की भलाई और कामयाबी के लिए दुआएं करायी। सज्जादानशीन हज़रत शाह ग़ाज़ी मियाँ हुज़ूर ने फातिहा पढ कुल की रस्म अदा की, इस मौके पर हाफ़िज़ गुलाम गौस, सादक़ैन सकलैनी, हाफ़िज़ शाहिद सकलैनी, मुफ्ती रूमान सकलैनी, मुर्तजा सकलैनी, हमज़ा सकलैनी, हाजी लतीफ सकलैनी, इन्तिज़ार सकलैनी, मोहम्मद उमर सकलैनी, रफ़ी सकलैनी, उस्मान सकलैनी आदि मौजूद रहे।
सामूहिक रोजा इफ्तार का एहतिमाम
कुल के बाद सभी ज़ायरीन व मुकामी अकीदतमंदो रोजेदारो का बड़े पैमाने पर इफ्तार कराया गया, सामुहिक इफ्तार में हज़ारों लोगों ने एक साथ बैठकर इफ्तार का लुत्फ लिया और इफ्तार के बाद मगरिब की नमाज पढ़कर लोग सज्जादानशीन को सलाम कर अपने घरों को रुखसत हो गए।













































































