परीक्षित ने ऋषि के गले में डाला सर्प,पुत्र ने दिया शाप
चनी गांव में भागवत कथा का चौथा दिन
बिल्सी। तहसील क्षेत्र के गांव चनी में पंचायत घर पर चल रही श्रीमद् भागवत कथा के चौथे दिन प्रयाग आश्रम बृजधाम वृंदावन से पधारी कु.कल्पना शास्त्री ने भक्तों को कथा का रसपान कराते हुए शुकदेव परीक्षित संवाद का वर्णन करते हुए कहा कि एक बार परीक्षित महाराज वनों में काफी दूर चले गए। उनको प्यास लगी,पास में समीक ऋषि के आश्रम में पहुंचे और बोले ऋषिवर मुझे पानी पिला दो मुझे प्यास लगी है, लेकिन समीक ऋषि समाधि में थे। इसलिए पानी नहीं पिला सके। परीक्षित ने सोचा कि इसने मेरा अपमान किया है। मुझे भी इसका अपमान करना चाहिए। उसने पास में से एक मरा हुआ सर्प उठाया और समीक ऋषि के गले में डाल दिया। यह सूचना पास में खेल रहे बच्चों ने समीक ऋषि के पुत्र को दी। ऋषि के पुत्र ने नदी का जल हाथ में लेकर शाप दे डाला जिसने मेरे पिता का अपमान किया है। आज से सातवें दिन तक्षक नामक सर्प पक्षी आएगा और उसे जलाकर भस्म कर देगा। समीक ऋषि को जब यह पता चला तो उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा कि यह तो महान धर्मात्मा राजा परीक्षित है और यह अपराध इन्होंने कलियुग के वशीभूत होकर किया है। देवयोग वश परीक्षित ने आज वही मुकुट पहन रखा था। समीक ऋषि ने यह सूचना जाकर परीक्षित महाराज को दी कि आज से सातवें दिन तक्षक नामक सर्प पक्षी तुम्हें जलाकर नष्ट कर देगा। यह सुनकर परीक्षित महाराज दुखी नहीं हुए और अपना राज्य अपने पुत्र जन्मेजय को सौंपकर गंगा नदी के तट पर पहुंचे। वहां पर बड़े बड़े ऋषि, मुनि देवता आ पहुंचे और अंत मे व्यास नंदन शुकदेव वहां पर पहुंचे। शुकदेव को देखकर सभी ने खड़े होकर शुकदेव का स्वागत किया। शुकदेव इस संसार में भागवत का ज्ञान देने के लिए ही प्रकट हुए हैं। इस मौके पर भीष्मपाल, हरप्रसाद, सौरभ शर्मा, राजीव कुमार, महादेव प्रसाद, तेजपाल, बनवारी लाल, प्रवीन शर्मा, गोविंद शर्मा, किशनलाल, दिनेश कुमार, विपिन शर्मा, बाबूराम, निसार अली, जयप्रकाश, सुम्मेर प्रसाद आदि मौजूद रहे।













































































