बरेली। आला हजरत इमाम अहमद रज़ा खां फाज़िले बरेलवी के 108वें उर्स-ए-रज़वी में इस बार एक ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है। दरगाह की ओर से जारी निर्देश के बाद उर्स में लगने वाले सभी लंगरों में मांसाहारी भोजन की जगह पूरी तरह शाकाहारी भोजन परोसा जा रहा है। 1921 से शुरू हुए उर्स के इतिहास में यह पहला अवसर है, जब चिकन और मटन बिरयानी के स्थान पर मटर, पनीर और आलू की बिरयानी, दाल-रोटी सहित अन्य शाकाहारी व्यंजन श्रद्धालुओं को खिलाए जा रहे हैं। उर्स से जुड़े पदाधिकारियों ने बताया कि यह फैसला सावन माह और कांवड़ यात्रा के सम्मान में लिया गया है। इसका उद्देश्य धार्मिक आस्था का सम्मान करते हुए हिंदू-मुस्लिम एकता, आपसी भाईचारे और सामाजिक सौहार्द का संदेश देना है। उर्स में आने वाले लाखों जायरीन और श्रद्धालु शाकाहारी भोजन ग्रहण कर रहे हैं और इस पहल की सराहना कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आला हजरत ने अपने पूरे जीवन में सूफी विचारधारा, शिक्षा, संवाद, अमन और भाईचारे का संदेश दिया। उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इस वर्ष यह निर्णय लिया गया है ताकि पूरी दुनिया को आपसी सम्मान और एकजुटता का सकारात्मक संदेश दिया जा सके।वक्ताओं ने अपने संबोधन में आला हजरत के ब्रिटिश शासन के प्रति विरोध का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आला हजरत अंग्रेजी हुकूमत के कट्टर विरोधी थे। बताया गया कि उस समय डाक टिकट पर छपी महारानी विक्टोरिया की तस्वीर वाले टिकट को वह उल्टा लगाते थे, जिसे अंग्रेजी हुकूमत के प्रति उनके विरोध का प्रतीक माना जाता है। उर्स प्रबंधन का कहना है कि यह पहल धार्मिक परंपराओं के साथ-साथ सामाजिक सद्भाव को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश है।