भगवान शंकर ग्यारह प्रकार से प्रभु श्री राम के लिए रोते रहते हैं इसलिए ग्यारह रूद्र हुए।
बरेली के प्राचीनतम एवं भव्यतम बाबा त्रिवटी नाथ मंदिर के श्री रामालय में आयोजित श्रीरामचरितमानस कथा के आज अष्टम् दिवस परम पूज्य कथा व्यास पं देवेन्द्र उपाध्याय ने बताया कि भगवान शंकर के रूद्र नाम की व्याख्या करते हुए बताया कि
रूद्र का अर्थ है कि जो रामजी के प्रेम में विभोर हो कर रोते रहते हैं उन्हें रूद्र कहते हैं।
कथा व्यास कहते हैं कि भगवान शंकर ग्यारह प्रकार से प्रभु श्री राम के लिए रोते रहते हैं इसलिए ग्यारह रूद्र हुए।
कथा व्यास कहते हैं कि नाराद जी ने भक्ति सूत्र में ग्यारह आसक्तियों का वर्णन किया है। यह आसक्क्तियां प्रभु श्रीराम में है तथा यही आसक्क्तियां भगवान शंकर में हैं।
कथा व्यास कहते हैं कि नारद जी ने माता पार्वती का हाथ देख कर भगवान शंकर के ग्यारह गुणों का वर्णन किया है परंतु उन गुणों को दोष के रूप में कहा। जब गुणों का वर्णन दोष के रूप में कहा जाता है तब इसको व्याज स्तुति कहते हैं।
नारद जी ने माता पार्वती को उनके माता-पिता के समक्ष भगवान शंकर के ग्यारह दोषों का वर्णन किया परंतु वास्तव में यह भगवान के गुण थे। इन फूलों को माता पार्वती ने सहज ही समझ लिया परंतु उनके माता-पिता इन दोष रूपी गुणों को नहीं समझ सके। माता पार्वती भगवान शंकर के दो श्रुति गुणों को सुनकर अति प्रसन्न हो गई कि मेरे महादेव के गुणों का वर्णन हो रहा है।
कथा व्यास बताते हैं कि एक बार ब्रह्मा जी ने भगवान शंकर की ब्याज स्तुति माता पार्वती के समक्ष करते हुए विनती की कि माता मुझे सृष्टि रचने का जो कार्य दिया गया है उसको अब मैं नहीं कर सकता। माता पार्वती ने पूछा कि आप ऐसा क्यों करना चाहते हो। ब्रह्मा जी ने बड़े भाव से माता पार्वती को बताया कि मस्तक पर लिखने का जो भाग्य का कार्य मुझको दिया गया है वह मैं भोलेनाथ के कारण अब नहीं कर सकता।
कथा व्यास बताते हैं कि ब्रह्मा जी ने कहा कि मैं जिसको निर्धन बना देता हूं और वह निर्धन यदि हर हर महादेव कहते हुए उन पर जल चढ़ा देता है तो उसको भगवान शंकर अपनी दयालुता के कारण धनवान और सम्रद्धि बना देते हैं।कोई मूर्ख यदि ऊँ नमः शिवाय कहने मात्र से उसे बुद्धिमान बना देते हैं।तब हमारा इस सृष्टि को रचने का क्या लाभ है।
कथा व्यास कहते हैं कि ब्रह्मा जी माता पार्वती से कहते हैं कि आपके पति मानो बावरे हो गये हैं और अपने भक्तों को सब कुछ प्रदान कर देते हैं।आप मुझ पर कृपा करें और यज्ह दायित्व किसी और को करने के लिए दे दीजिए।
कथा व्यास कहते हैं कि इसको ब्याज स्तुति कहते हैं।यह दिखता वर्णन दोषों का है परंतु वास्तव में यह भगवान शंकर के गुणों का वर्णन है।
कथा व्यास कहते हैं कि भक्त जब पूर्ण रूप से परमात्मा को अपना स्वामी मान लेता है और अपना विश्वास उनके चरणों में अर्पित कर देता है तभी सन्मार्ग की प्राप्ति हो सकती है।अंगद धर्म के मार्ग को अपनाते हुये भगवान राम के चरणों में स्थान प्राप्त करते हैं। भगवान राम अपने दूत के रूप में अंगद को रावण के पास भेजते हैं और उन्हें वार्तालाप का पूरा अधिकार प्रदान करते हैं।अंगद के पैर को रावण की सभा में कोई भी हटा नहीं पाता है।तात्पर्य है कि धर्म और नीति का पथ ही सबसे अधिक उत्तम होता है।अनीति के लिये किसी भी बात का कोई मूल्य नहीं होता परन्तु नीतिगत किया गया कार्य तर्क संगत और सर्वमान्य और मूल्यवान होता है।अंगद नीति तथा धर्म के अनूरूप रावण को सन्मार्ग दिखाने का प्रयास करते हैं कि तुम मेरे पैर के स्थान पर यदि प्रभु श्रीराम के चरण कमल प्राप्त करने का प्रयास करो तभी तुम्हारा उद्धार सम्भव है परन्तु रावण अपने अहंकार के मद में ग्रसित होते हुये सन्मार्ग की राह नहीं देख पाता है।
कथा व्यास कहते हैं कि परमात्मा किसी ना किसी माध्यम से हम मनुष्यों को सन्मार्ग दिखाने का प्रयास करते हैं और जो भी प्राणी इस अवसर का सदुपयोग कर लेता है तभी उसका कल्याण हो सकता है।रावण रूपी अंधकार और अहंकार को दूर करने के लिये राम नाम के कल्प तरू की छांव में जाने से से सद्गति की परम कृपा और श्रीराम नाम की प्राप्ति हो सकती है और जीवन को परम मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।
मन्दिर सेवा समिति के मीडिया प्रभारी संजीव औतार अग्रवाल ने आज कथा विश्राम होने पर कथा व्यास का मन्दिर सेवा समिति की ओर से आभार प्रकट किया तथा विगत अनवरत २८ वर्षों से कथा श्रवण कराने के लिए साधुवाद किया।
आज की कथा में मंदिर के रामालय में उपस्थित काफी संख्या में भक्तजनों ने श्री रामायण की आरती करी तथा प्रसाद वितरण हुआ।
आज की कथा में मंदिर कमेटी के प्रताप चंद्र सेठ ,मीडिया प्रभारी संजीव औतार अग्रवाल,सुभाष मेहरा, हरिओम अग्रवाल का मुख्य सहयोग रहा।














































































