अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की क्रांतिकारी विरासत को आगे बढ़ाओ – प्रेमपाल सिंह

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बदायूँ। मालवीय आवास गृह में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन जिसका विषय – नारी मुक्ति का सवाल और हमारे कार्यभार पर किया गया।
गोष्ठी की अध्यक्षता रसोइया कर्मी जरीना बेगम ने की, संचालन आंगनवाड़ी संगठन की जिलाध्यक्ष मिथलेश कुमारी ने की तथा गोष्ठी की मुख्य वक्ता आशा संगिनी की जिलाध्यक्ष जौली वैश्य रहीं।
वक्ताओं ने कहा कि आज का दिन दुनियां भर की मेहनतकश महिलाओं के लिए हर तरह के शोषण उत्पीड़न और गैरबराबरी के खिलाफ संघर्षों का दिन है। आज इक्कीसवीं सदी में तमाम संवैधानिक और कानूनी अधिकारों के औपचारिक तौर पर लागू होने के बाद भी महिलाओं के खिलाफ अन्याय एवं अत्याचार की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। सामाजिक प्रगति के बावजूद अभी भी महिलाओं की दोयम दर्जे की स्थिति है। वे दोहरी-तिहरी दासता की जंजीरों में जकड़ी हुयी हैं तो इसका कारण उनके अपने प्रयासों अथवा मेहनत की कमी में नहीं हैं। महिलाओं को जहां भी, जितना भी अवसर मिला है उन्होंने साबित किया है कि वे किसी भी मामले में मर्दों से कमतर नहीं हैं। सवाल फिर यह उठता है कि वह क्या चीज है जो महिलाओं को समाज में वह जीवन जीने से रोकती है जिस पर हर इंसान का सहज, स्वाभाविक हक होना चाहिए।

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इस सवाल की गहराई में उतरने पर हम पाते हैं कि एक तो समाज में हर महिला की स्थिति एक समान नहीं है। किसी के लिए समाज में वह सब कुछ हासिल करना एकदम आसान है जो कुछ पुरुषों को हासिल है। कई-कई महिलाओं के लिए गैर बराबरी कुछ खास बड़ा मुद्दा नहीं है। इनमें से कई तो कह सकती हैं कि उनके अपने जीवन में उन्होंने अपने घर-परिवार से लेकर अपने जीवन स्तर के अनुरूप सामाजिक जीवन में कोई भेदभाव, उत्पीड़न व दमन नहीं झेला। इन चंद महिलाओं के उलट सामाजिक हैसियत व स्तर की कुछ महिलाएं कह सकती हैं कि हां कुछ-कुछ उन्होंने अपने औरत होने के नाते झेला है। जाहिरा तौर पर ये महिलाएं वे हैं जो समाज के शीर्ष स्तर पर बैठी हैं। शासक वर्ग की हिस्सा हैं। इस वर्ग की महिलाएं उन सवालों से रोज-ब-रोज नहीं जूझतीं जिससे हमारी दुनिया व हमारे देश में करोड़ों-करोड़ मेहनतकश महिलाएं जूझती हैं।
मध्यम वर्ग की स्त्रियों को भेदभाव, उत्पीड़न, अपमान तब अधिक झेलना पड़ता है जब वे आत्मनिर्भर नहीं होती हैं। पिछड़ी मूल्य-मान्यताएं, पुराने रीति-रिवाज पूरी उम्र उनका पीछा करते हैं। एक आदर्श नारी साबित करने का बोझ उन्हें सताता रहता है। आजादी, बराबरी, मुक्ति, न्याय जैसे शब्द इनके यहां व्यक्तिपरक महत्व रखते हैं न कि सामाजिक व राजनैतिक महत्व रखते हैं।

जहां तक ​​सवाल है दुनिया या देश की करोड़ों-करोड़ मजदूर मेहनतकश स्त्रियों का है, उनका यहां जीवन नारकीय है। शोषण, उत्पीड़न, दमन, अत्याचार, अन्याय यहां विविध रूप रख के पल-पल सामने आते रहते हैं। जितना विपदा के मारे मजदूर मजदूर-मेहनतकश पुरुष हैं उतने ही या उससे अधिक विपदा की मारी औरतें-बच्चे और बूढ़े हैं। औरत होना यहां अक्सर अतिरिक्त विपदा या अभिशाप का कारण या वाहक बन जाता है। नारकीय जीवन परिस्थितियों के साथ भूख, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, अभाव, बीमारी मनुष्यों के साथ जो न करें। जो कुछ भी उनके साथ होता है उसका अनुभव या उसकी समझ से ऊपर के दोनों वर्गों को न तो हो सकती है और न वे इसकी कल्पना कर सकते हैं। और इसमें ऊपर के वर्ग के लोग हों अथवा मजदूर-मेहनतकश हों वे इन बुरी परिस्थितियों के लिए व्यक्तियों में दोष ढूंढते हैं। वे आसानी से यह नहीं समझ सकते हैं कि यह व्यक्तियों के जीवन या सोच के कारण नहीं बल्कि वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था के कारण है।

आठ मार्च का दिन मजदूर-मेहनतकश महिलाओं का एक ऐसा दिन है जब वे तसल्ली से इस बात पर विचार करती हैं कि क्या सही है और क्या गलत। मुक्ति और गुलामी क्या है। उनका अतीत क्या व भविष्य क्या है। कौन उनका साथी है और कौन उनकी मुक्ति की राह में रोड़ा है।

आठ मार्च का दिन मजदूर-मेहनतकश महिलाओं का ऐसा दिन है जब वे अपने अतीत के संघर्षों को याद करती हैं और भविष्य के संघर्षों की तैयारी करती हैं। आठ मार्च का दिन मानव जाति की महान क्रांतियों और उनमें निभाई गई महिलाओं की भूमिका को याद करने का दिन है।

आठ मार्च का दिन सिर्फ औरतों का ही नहीं उन मर्दों का भी दिन है जो अच्छे से जानते हैं कि मज़दूर मेहनतकश औरतों के जागे और आगे आए बगैर मानव मुक्ति का एक भी कदम नहीं उठाया जा सकता है। यह औरतों की मुक्ति में हर उस मर्द के सहयोग व संकल्प लेने का दिन है जो मानता है कि मानव मुक्ति औरतों की मुक्ति के बिना संभव नहीं है।

आठ मार्च का दिन हर उस शहीद को याद करने का दिन है जिन्होंने शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष में अपने प्राणों का बलिदान किया।
गोष्ठी को मिथलेश कुमारी , जौली वैश्य, जरीना बेगम, ममता भदौरिया, मनीषा, नीतू मिश्रा, निर्दोष राठौर, राजेश सक्सेना, रविकांत भारती, डा सतीश, प्रेमपाल सिंह, कृष्ण गोपाल, राजेश जौहरी, राकेश,कॉमरेड नफीस अहमद आदि लोगों ने संबोधित किया।
कार्यक्रम में सुरेखा, विमला, अँजरा, रुबीना, रूबी, राबिया, रईसा, सितारा, रौनक, सितारा, इस्मा आदि महिलाएं उपस्थित रहीं।

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