महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव: जानिए बीएमसी का 200 साल पुराना इतिहास और अब तक हुए बड़े बदलाव

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मुंबई। महाराष्ट्र के 29 नगर निगमों की सीटों पर 15 जनवरी को चुनाव कराए जाएंगे, जबकि 16 जनवरी को मतगणना होगी। यह चुनाव करीब तीन साल की देरी से हो रहे हैं। इनमें देश के सबसे शक्तिशाली और समृद्ध नगर निकायों में शामिल बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) भी है, जो देश की वाणिज्यिक राजधानी मुंबई के रोजमर्रा के कामकाज से लेकर दीर्घकालिक विकास योजनाओं की जिम्मेदारी संभालती है। आज बीएमसी का बजट कई राज्यों से भी अधिक है, लेकिन इसकी शुरुआत बेहद सीमित स्तर से हुई थी।

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बीएमसी की नींव 19वीं सदी में रखी गई। वर्ष 1807 में इसका स्वरूप केवल पेटी सेशन्स कोर्ट तक सीमित था, जहां दो मजिस्ट्रेट और एक जस्टिस ऑफ पीस छोटे अपराधों की त्वरित सुनवाई करते थे। 1845 में संरक्षण बोर्ड का गठन किया गया, जो साफ-सफाई और नगर व्यवस्था की देखरेख करता था। 1858 में तीन आयुक्तों के बोर्ड का गठन हुआ, जिसने नगर प्रशासन को संगठित रूप दिया।

बीएमसी के इतिहास में वर्ष 1865 महत्वपूर्ण रहा, जब एक नगर आयुक्त और निगमित निकाय का गठन किया गया। बॉम्बे अधिनियम संख्या-III, 1872 के तहत 64 सदस्यों के साथ नियमित निगम बना। इन सदस्यों को चुनने का अधिकार केवल करदाताओं को दिया गया। 4 सितंबर 1873 को नागरिक निकाय की पहली बैठक आयोजित हुई। स्थापना के 100 वर्ष बाद 1907 में प्राथमिक शिक्षा की जिम्मेदारी निगम को सौंपी गई। 1922 में मतदान व्यवस्था में बदलाव कर किरायेदारों को भी मताधिकार दिया गया।

1931 में अध्यक्ष का पद ‘मेयर’ कहलाया और 1933 में इम्प्रूवमेंट्स ट्रस्ट का निगम में विलय हुआ। आजादी के बाद 1948 में पहली बार वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव हुए। 1950 में उपनगरों को निगम में शामिल किया गया और 1952 में सभी पदेन सदस्य हटाकर बीएमसी को पूर्णतः निर्वाचित निकाय बनाया गया। 1968 में महाराष्ट्र अधिनियम के तहत पहली बार चुनाव हुए और 1972 में मराठी को निगम की आधिकारिक भाषा घोषित किया गया।

वर्ष 1973 में बीएमसी ने 100 वर्ष पूरे किए। इसके बाद अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग और महिलाओं के लिए आरक्षण लागू हुआ। 1990 में महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत सीटें आरक्षित की गईं, जिसे बाद में एक-तिहाई तक बढ़ाया गया। 1996 में ‘बॉम्बे’ का नाम बदलकर ‘मुंबई’ किया गया। 1999 में उप महापौर और विपक्ष के नेता के पद की शुरुआत हुई।

2000 के बाद महापौर-उप महापौर का कार्यकाल ढाई वर्ष किया गया। 2002 में पार्षदों की संख्या बढ़कर 227 हुई। 2007 में मेयर, उप मेयर और समितियों के अध्यक्षों के चुनाव हाथ उठाकर कराने का प्रावधान लागू किया गया।

करीब दो सदियों के सफर में छोटे प्रशासनिक निकाय से शुरू हुई बीएमसी आज देश की सबसे ताकतवर नगर पालिकाओं में शुमार है और आगामी चुनाव इसके भविष्य की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

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