“युद्धकाल में राष्ट्रहित के विमर्श निर्माण में पत्रकारों की भूमिका अति- महत्वपूर्ण”

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नोएडा। भारत पाकिस्तान के चार दिन के युद्ध के उपरांत अंतर्राष्ट्रीय मंच में राष्ट्रीय स्तरीय विमर्श निर्माण में पत्रकारों की महत्वपूर्ण भूमिका है। नारद जयंती और हिंदी पत्रकारिता के उपलक्ष में आयोजित कार्यक्रम में “युद्धकाल में पत्रकारिता” विषय पर बोलते हुए मुख्य अतिथि अखिलेश शर्मा इस संगोष्ठी के आयोजन एवं विषय की प्रसंशा की। उनके मुताबिक पत्रकार होने के नाते युद्ध काल या ऐसे किसी भी महत्वपूर्ण समय में पत्रकारों जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है ऐसे समय में नागरिकों के लिए सूचना के अभाव को भरना बहुत जरूरी है। क्या युद्ध काल में अपने दायित्व का पालन कर रहे हैं या नहीं? ये देखना बहुत जरूरी है। साथ ही उन्होंने इस बात भी जोर दिया कि ऐसे में ऐसी कोई भी सूचना आपकी तरफ से नहीं प्रस्तुत की जानी चाहिए जिससे दुश्मन को सहायता मिले। बतौर पत्रकार हमें अपनी सीमा, मर्यादा, जिम्मेदारी और दायित्व नहीं भूलना चाहिए।आद्य संवाददाता देवर्षि नारद जयंती एवं हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर “प्रेरणा शोध संस्थान न्यास” द्वारा “युद्धकाल में पत्रकारिता” विषय पर नोएडा स्थित एएसपीएम स्कॉटिश स्कूल में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया।इस संगोष्ठी में मीडिया जगत की कई प्रतिष्ठित हस्तियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रुप में एनडीटीवी के मैनेजिंग एडिटर अखिलेश शर्मा रहे। जबकि कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि के रूप में टीवी9 की एसोसिएट एडिटर प्रमिला दीक्षित एवं वरिष्ठ पत्रकार, टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क के सीनियर एंकर दिनेश गौतम की उपस्थिति रही।श्रद्धेय गुरु गोलवलकर के कथन से अपने उद्बोधन की आरंभ करने वाली विशिष्ट अतिथि प्रमिला दीक्षित ने युद्ध काल में नागरिक बोध एवं पत्रकारों के बोध पर चर्चा करते हुए बताया कि युद्ध काल में पत्रकार भी एक हथियार के रूप में प्रयुक्त होते हैं। प्रमिला दीक्षित ने कहा कि युद्ध काल में नैरेटिव निर्माण की भूमिका भी बड़ी महत्वपूर्ण हो जाती है इसलिए “भारत से जुड़ी किसी भी जानकारी के लिए भारतीय स्रोतों पर ही भरोसा करें, न कि पाकिस्तानी प्रचार तंत्र पर।”कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि एवं टाइम्स नाउ नवभारत के सीनियर एंकर दिनेश गौतम ने “युद्धकाल में पत्रकारिता” विषय पर बोलते हुए कहा हम ये मान लेते हैं कि युद्ध लड़ना केवल सेना का काम है। लेकिन युद्ध कई स्तर में लड़ा जाता है। पहलगाम के आतंकी घटना से आतंकियों ने केवल देश के प्रधानमंत्री मोदी जी को नहीं बल्कि समस्त देश को एक चुनौती दी थी जिसका जबाव हमारी सरकार ने पाकिस्तान को बखूबी दिया।

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उन्होंने कहा कि पहलगाम की घटना एक आतंकवादी घटना नहीं एक धर्म युद्ध था जहां आम लोगों को धर्म पूछ कर मारा। उनके मुताबिक जब देश युद्धरत होता है तो आम आदमी भी उस युद्ध में कहीं न कहीं शामिल होते हैं इसलिए एक पत्रकार के तौर पर हमने जो किया वो देश को आगे रखने के लिए किया।कार्यक्रम के मुख्य वक्ता कृपाशंकर, प्रचार प्रमुख (उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड), राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ रहे, जिन्होंने युद्धकालीन परिस्थितियों में पत्रकारों की भूमिका पर विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि उदंत मार्तंड की शुरुआत देवर्षि नारद जयंती के अवसर पर किया इससे यह प्रमाणित होता है कि हिंदी पत्रकारिता में नारद जी की क्या भूमिका है लेकिन हम धीरे-धीरे नारद जी को भूलते चले गए। उन्होंने संघ के समाजिक योगदान एवं पंच परिवर्तन की चर्चा करते हुए समाजिक बदलाव में मीडिया की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।कार्यक्रम का शुभारंभ हरिश्चंद्र के ओजस्वी गीत के उपरांत अतिथिगण द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के बाद, संसद टीवी के संपादक श्याम किशोर सहाय ने कार्यक्रम की प्रस्तावना में देवर्षि नारद पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि पुराणों में नारदजी की विद्वत्ता और विवेकशीलता का वर्णन मिलता है, और यह कि ‘नैरेटिव सेटिंग’ का खेल समझना आवश्यक है। सहाय ने इस बात पर जोर दिया कि युद्ध का समय संवेदनशील होता है, और युद्ध केवल सीमाओं पर ही नहीं, बल्कि जनमानस में भी लड़ा जाता है; ऐसे में पत्रकार जनमत बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं। उन्होंने सलाह दी कि युद्धकाल में पत्रकारिता बड़ी सूझबूझ से करनी चाहिए।मंच संचालन आशीष और धन्यवाद ज्ञापन हरीश द्वारा किया गया, जिसके उपरांत छात्रा वंचिता सेठी के वंदेमातरम गायन से कार्यक्रम का समापन हुआ। वंशिका सेठी के साथ-साथ सभागार में उपस्थित सभी गणमान्य बंधु-भगिनियों द्वारा सामूहिक रूप से वंदेमातरम गाया गया। इस अवसर पर अतिथियों ने श्रोताओं के जिज्ञासा भरे प्रश्नों के समाधान भी दिए।कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मेरठ प्रान्त सह-प्रचार प्रमुख डाॅ अनिल सहित बड़ी संख्या में पत्रकार, छात्र, शोधार्थी व बुद्धिजीवी वर्ग उपस्थित थे। संगोष्ठी के माध्यम से युद्धकाल में निष्पक्ष, निर्भीक और राष्ट्रहित में पत्रकारिता के मूल्यों पर गहन चर्चा हुई।

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