पूर्व जन्मों की स्मृति से अक्षरबोधि रहित ब्रह्मचारी कृष्णदत्त जी ने किया भगवान राम के जीवन का साक्षात वर्णन

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गाजियाबाद। जिले के ग्राम खुर्रमपुर- सलेमाबाद में, एक विशेष बालक का जन्म हुआ जो बचपन से ही जब भी यह बालक सीधा, श्वासन की मुद्रा में लेट जाता या लिटा दिया जाता, तो उसकी गर्दन दायें-बायें हिलने लगती, कुछ मन्त्रोच्चारण होता और उपरान्त विभिन्न ऋषि-मुनियों के चिन्तन और घटनाओं पर आधारित 45 मिनट तक, एक दिव्य प्रवचन होता। पर इस जन्म में अक्षर बोध भी न करने वाला ग्रामीण बालक, उसके मुख से ऐसे दिव्य प्रवचन सुनकर जन-मानस आश्चर्य करने लगा, बालक की ऐसी दिव्य अवस्था और प्रवचनों की गूढ़ता के विषय में कोई भी कुछ कहने की स्थिति में नहीं था। इस स्थिति का स्पष्टीकरण भी दिव्यात्मा के प्रवचनों से ही हुआ। कि यह आत्मा सृष्टि के आदिकाल से ही विभिन्न कालों में, शृङ्गी ऋषि की उपाधि से विभूषित और इसी आत्मा के द्वारा राजा दशरथ के यहाँ पुत्रेष्टि याग कराया गया,और अब जब वे समाधि अवस्था में पहुँच जाते है तो पूर्व जन्मों की स्मृति के आधार पर प्रवचन करते ,यहाँ प्रस्तुत हैं क्रमिक रूप से माता कौशल्या का दिव्य और तपस्वी जीवन ) पुत्रेष्टि याग जब राजा दशरथ के कोई सन्तान का जन्म नही हुआ,तो एक समय राजा दशरथ महर्षि वशिष्ठ मुनि महाराज के द्वार पर पंहुचें,माता अरून्धती और वशिष्ठ मुनि महाराज प्रातःकालीन याग करके अपने ब्रह्मचारियों के मध्य में उपदेश दे रहे थे। राजा उनके समीप पंहुचे,तो ऋषि ने उनका स्वागत किया। वे विराजमान हो गये,तो ऋषि ने कहा कि-कहो राजन! कैसे आगमन हुआ है? दशरथ ने कहा कि-प्रभु! अयोध्या राष्ट्र ऋषियों की अनुपम कृपा से ऊर्ध्वा में गमन करता रहा है। जब महाराजा दिलीप के कोई सन्तान नही हुई,तो ऋषि मुनियों ने ही पुत्रेष्टि याग किया और रघु का जन्म हुआ। इसी प्रकार भगवन! अब पुनः से धर्म संकट आ गया है,इसका उद्धार कीजिए। महर्षि वशिष्ठ बोले- कि पुत्रेष्टि याग कराओ,तो पुनः से तुम्हारे राष्ट्र की आभा में ,पुत्र का जन्म हो सकता है।(प्रवचन सन्दर्भ 16-07-1962) जब राजा दशरथ के यहाँ पवित्र यज्ञ कर्म प्रारंभ हुआ,उस समय तीनों पत्नियां और राजा दशरथ लगभग एक वर्ष तक ब्रह्मचर्य का व्रत लेते हुए पृथ्वी पर उनका आसन रहा। जब यज्ञ का समय हुआ,तो ब्रह्मा की आवश्यकता हुई। महर्षि वशिष्ठ से कहा कि-प्रभु! यज्ञ का समय हो गया है,यज्ञ आरम्भ कराईये। तो ऋषि बोले- मै तो यज्ञ कर्म कराने का अधिकारी नही हूँ, जिस विषय को मै जानता नही,उस विषय का ले करके मै यज्ञ कर्म करूं,तो ये मेरे सामर्थ्य नही हैं । राजा ने कहा तो क्या होना चाहिए,प्रभु !,ऋषि ने कहा-हे राजन! इस यज्ञ को कराने के अधिकारी तो महर्षि शृंगी है,उन्हें कजली वनों से लाईये,जहाँ उनके पिता की उन्हें संयमी बनाने की धारणा रहती है। पुत्रेष्टि यज्ञ कराने का वही अधिकारी होता है,जो आयुर्वेद का महान पण्डित होता है और आयुर्वेद का पंडित ही यज्ञ की सुगन्धित औषधियो को जानता है कि यज्ञ में कौन कौन सी औषधियो का पान कराने से यज्ञमान की नासिका, नेत्रो व उसकी रसना के अग्रभाग के कौन-कौन से रोग दूर होते है। यह सब आयुर्वेद का पंडित ही जानता है। (प्रवचन सन्दर्भ 17-07-1970) शृंगी ऋषि से पुत्रेष्टि याग
महर्षि वशिष्ठ मुनि महाराज ने भयंकर वन को गमन किया और भ्रमण करते,वे कजली बनों में पंहुचे। उन्होंने वहा शृंगी ऋषि को निमन्त्रण दिया। निमन्त्रण के अनुसार अयोध्या में उनका आगमन हुआ। आगमन पर यज्ञशाला की रचना हुई, जहाँ महर्षि वायु मुनि महाराज और अंगिरस आदि सब विद्यमान हो थे। शृंगी जी ने याग का विधान किया और पुत्रेष्टि याग की रचना की,नाना प्रकार की वनस्पतियो को ले करके उन्होने पुत्रेष्टि याग की रचना की। नाना प्रकार की वनस्पतियों को ले करके पुत्रेष्टि याग का चरू बनाया,उन्होंने गो-दुग्ध और कुछ वृक्षों का रस ले करके एक प्रसाद का निर्माण किया,याग प्रारंभ किया,और कुछ समय तक याग चलता रहा, क्योंकि वे ब्रह्मवर्चोसि थे और ब्रह्मवर्चोसि ही याग का वर्णन कर सकता है ।(प्रवचन सन्दर्भ 16-07-1992) महर्षि वेती अंगिरा मुनि महाराज उस याग में विद्यमान हंए और महर्षि शृंगी ने उस याग को पूर्णता में परिणित कराया। याग करने के पश्चात याग की भूमिका में आचार्यो ने यह उपदेश दिया- हे राजन! तुम अपने को ब्रह्म में पिराया हुआ स्वीकार करो,कयोंकि ब्रह्मचर्य का अभिप्रायः यही होता है, जो अपने को ब्रह्म में पिरो देता है। अंगिरा मुनि ने नाना प्रकार के साकल्यो को ले करके उसे शृंगी ऋषि की सहायता से उस याग में औषधियो का एक पात बनाया और पात बना करके औषधियों के पात को देवियो को प्रदान कर दिया। (प्रवचन सन्दर्भ 30-07-1990) 2- पूज्यपाद गुरुदेव ब्रह्मर्षि कृष्ण दत्त जी महाराज के दिव्य प्रवचनों की श्रृंखला क्रमशः जारी…….

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कृष्णावतार त्यागी

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