पशुओं में एएमआर बड़ी समस्या इसके निदान में पशु चिकित्सकों की महत्वपूर्ण भूमिका

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बरेली। पशुओं में एएमआर बहुत बड़ी समस्या है इसके निदान में पशु चिकित्सकों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। उभरती और फिर से उभरती बीमारियों के प्रबन्धन और वर्तमान दृष्टिकोण पर महाराष्ट्र पशुपालन विभाग के पशु चिकित्साधिकारियों के साथ भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आई वी आर आई) तथा प्रशिक्षण और शिक्षण केन्द्र पुणे द्वारा इंटरफेस मीटिंग में कुल 327 प्रतिभागी शामिल हुए। इस अवसर पर महाराष्ट्र पशुपालन विभाग के कमिशनर डॉ प्रवीण कुमार देओरे ने कहा कि महाराष्ट्र पशुपालन विभाग महाराष्ट्र के पशुपालकों के लिए बहुत सारे कार्यक्रम चला रहा है जिसमें पशुओं की पीपीआर एवं बू्रसलोसिस बीमारी के रोकथाम आदि शामिल है। उन्होंने कहा कि एएमआर बहुत बड़ी समस्या है इसके निदान में पशु चिकित्सकों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। उन्होंने आईवीआरआई द्वारा किये गये प्रयासों की सराहना की तथा वैज्ञानिकों को इस तरह के इण्टरफेस करने के लिए बधाई दी। इस अवसर पर महाराष्ट्र पशुपालन विभाग के संयुक्त कमिशनर प्रकाश अहिराव भी उपस्थित रहे।
इस अवसर पर आईवीआरआई के निदेशक डॉ त्रिवेणी दत्त ने कहा कि संस्थान ने अपनी यात्रा इम्पीरियल बैक्टीरियोलॉजिकल के रूप में सन 1889 में शुरू की तब से यह संस्थान पशुधन की सेवा कर राष्ट्र के उत्थान में अपना योगदान दे रहा है। उन्होंने कहा कि आईवीआरआई ने देश के विभिन्न क्षेत्रो मे इंटरफेस मीट किये तथा उन क्षेत्रों की समस्याओं के निदान के लिए कई पैकेज ऑफ प्रैक्टिस विकसित किये हैं। उन्होंने कहा कि संस्थान ने रिंडरपेस्ट बीमारी का उन्मूलन किया है तथा पशुओं की बीमारियों के लिए कई पशु स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू किये हैं। संस्थान ने खुरपका मुंहपका, ब्रूसेलोसिस तथा क्लासिकल स्वाइन फीवर वैक्सीन का निमार्ण किया है। संस्थान के उत्कृष्ट कार्यों के लिए भारतीय डाक विभाग द्वारा एक पोस्टल कवर जारी किया गया। हाल ही में संस्थान ने सूकर की लैण्डली प्रजाति को विकसित किया है और रूहेलखण्डी बकरी तथा गाय का पंजीकरण करने की प्रक्रिया में है। उन्होंने कहा कि संस्थान के वन्य प्राणी प्रबन्धन द्वारा देश के विभिन्न चिड़ियाघरों, सफारी को समय-समय पर दिशा निर्देश जारी किये जाते हैं। यही नहीं संस्थान का कैडराड विभाग देश भर में पशु आउटब्रेक अटैण्ड करता है तथा उसके निदान के लिए एडवाइजरी भी जारी करता है।

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उन्होंने संस्थान के बंग्लूरू, मुक्तेश्वर परिसरों द्वारा किये गये योगदान के बारे में भी बताया। डा. त्रिवेणी दत्त ने महाराष्ट्र पशुपालन विभाग के कमिशनर एवं संयुक्त कमिशनर तथा सभी पशुचिकित्साधिकारियों का इस इण्टरफेस मीट में भाग लेने तथा अपने महत्वपूर्ण सुझावों को देने के लिए आभार व्यक्त किया। संयुक्त निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ. (श्रीमती) रूपसी तिवारी ने सभी गणमान्य व्यक्तियों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए पिछली इंटरफेस बैठक में चिन्हित क्षेत्रों के लिए आईवीआरआई द्वारा की गई कार्रवाई का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि प्रतिभागियों ने अपने पंजीकरण में दी गई जानकारी से पता चला कि उनके क्षेत्रों में बार-बार प्रजनन और बांझपन, चयापचयी और पोषण संबंधी बीमारियां, थनैला, हैमेटोप्रोटोजाॅन रोग, जहर, संक्रामक रोग जिनमें एफएमडी, एसडी पीपीआर, लेप्टोस्पाइरा ब्लैक क्वार्टर, गोट पॉक्स, बकरियों में पिछले अंग का पक्षाघात और मृत्यु, भैंसों में गर्दन का पक्षाघात और मृत्यु, न्यूनतम बुनियादी ढांचा और श्रम शक्ति की कमी, फ्री रेंज चारागाह प्रणाली का अभाव, कम उत्पादकता, निदान सुविधा तथा अन्य विभागों की सुविधाओं का अभाव पशुधन क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण समस्यायें हैं। इसके अतिरिक्त प्रतिभागियों ने सर्जिकल तकनीक, मोल्यूकूलर निदान, अत्याधुनिक निदान तकनीक, अल्ट्रासाउण्ड तथा रेडियोलोजी, रिसेंट एडवासमेंटस इन मेडिसन, बायोलोजिकल प्रोडक्शन विथ स्टैण्डाइजेशन एण्ड जीएमपी, एएमआर तथा बांझपन और अन्य प्रजनन विकास पर प्रशिक्षण की आवश्यकता जतायी। प्रथम तकनीकी सत्र में, मानकीकरण विभाग के विभागाध्यक्ष डा. प्रणव धर ने पशु-मानव स्वास्थ्य के संदर्भ में उभरती और पुनः उभरती बीमारियों का अवलोकन तथा भविष्य में होने वाले प्रकोपों से निपटने की तैयारी पर, पशुजन स्वास्थ्य विभाग के विभागाध्यक्ष डा किरण भीलेगांवकर ने रोगाणुरोधी प्रतिरोध के मुद्दे और उनका प्रबंधन और नियंत्रण, संस्थान के डा. बबलू कुमार द्वारा पशु रोगों के निदान और रोकथाम के लिए आईवीआरआई प्रौद्योगिकियां तथा पुणे केन्द्र प्रभारी डा. एच.पी एैथल द्वारा क्षमता निर्माण और आजीविका सुधार के लिए प्रशिक्षण और शिक्षण केन्द्र पुणे की पहल पर व्याख्यान दिये गये। द्वितीय तकनीकी सत्र की अध्यक्षता संयुक्त निदेशक, प्रसार शिक्षा डॉ. रूपसी तिवारी ने की। प्रतिभागियों ने बछड़े के टीकाकरण, एफएमडी और एचएस के संयुक्त टीकाकरण, वन्यजीव रोगों का शीघ्र पता लगाने, थनेला रोग के लिए जड़ी-बूटी आधारित चिकित्सा, थनेला रोग में होम्योपैथी का उपयोग, दीर्घकालिक रिलीज वाली एंटीबायोटिक, जर्मप्लाज्म सुधार, पशु चिकित्सा जैविक की आपूर्ति पर अपनी शंकाओं को स्पष्ट किया, जिनका आईवीआरआई के विशेषज्ञों द्वारा उपयुक्त उत्तर दिया गया। प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता संस्थान के संयुक्त निदेशक, शोध डा. एस.के. सिंह तथा सह अघ्यक्ष डा. जी साई कुमार रहे जबकि द्वितीय सत्र की अध्यक्षता संयुक्त निदेशक, प्रसार शिक्षा डा. रूपसी तिवारी जबकि सह अध्यक्ष डा. बबलू कुमार रहे। कार्यक्रम में पुणे केन्द्र के प्रभारी डा. एच.पी. एैथल द्वारा सभी उपस्थितगणों का स्वागत किया गया जबकि धन्यवाद ज्ञापन पुणे केन्द्र के वैज्ञानिक डा. अमोल के भालेराव द्वारा दिया गया। इस अवसर पर संस्थान के संयुक्त निदेशक, शैक्षणिक डा. एस.के. मेंदीरत्ता, संयुक्त निदेशक, कैडराड डा. सोहिनी डे, मुक्तेश्वर परिसर के संयुक्त निदेशक डा. यशपाल सिंह मलिक, बंग्लूरू परिसर के संयुक्त निदेशक डा. पल्लब धर, कोलकाता परिसर के प्रभारी डा अर्नब सेन सहित संस्थान के सभी विभागाध्यक्ष आईवीआरआई औषधि विभाग के डा. अखिलेश कुमार उपस्थित रहे।

निर्भय सक्सेना

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