बरेली की हर दौर में रही ऐतिहासिक भूमिका डॉ तुलाई सिंह गंगवार

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बरेली। देश प्रदेश की राजधानी दिल्ली लखनऊ के बीच बसा बरेली महानगर अब स्मार्ट सिटी का दर्जा प्राप्त कर चुका है । आज के इस स्मार्ट सिटी बरेली की हर दौर में रही ऐतिहासिक भूमिका रही। बरेली का महाभारत काल में भी यहां के पांचाल एवम आंवला के द्रोपदी के किले के अवशेष आज भी है। भारत ने लगभग 700 वर्षों के विदेशी शासन में जागरूकता से स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए प्रयास नहीं किया किन्तु इसकी प्राप्ति की इच्छा इसके मस्तिष्कों में सदैव सुलगती रही और अन्ततः सन् 1857 ई. में वह घड़ी आ ही गई जब इनके धैर्य का बांध टूट गया और भारत के लोगो ने स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु प्रथम प्रयास किया। भारतीय स्वतंत्रता का इतिहास अपने आप में एक पूर्ण युग है। भारतीय स्वतंत्रता की प्राप्ति में भारत का प्रत्येक व्यक्ति और भारत का प्रत्येक भू भाग किसी न किसी रूप में अवश्य ही जुड़ा रहा है। जनपद बरेली स्वतंत्रता के निपत्ति काल से अर्थात 1857 ई. के विद्रोह से पूर्व ही प्रकाश में आ गया।
अतः देश के स्वतंत्रता की प्राप्ति के पश्चात इस प्रकार के अभाव की अनुभूति हुई कि बरेली जनपद के स्वतंत्रता संग्राम में स्वर्णिम योगदान का नकारा नहीं जा सकता। जनपद बरेली उत्तर प्रदेश की कमिश्नरी रोहेलखण्ड का एक प्रमुख जनपद एवं मुख्यालय है। यह पूर्व पश्चिम लगभग 60 मील तथा उत्तर-दक्षिण में 47 मील तक फैला हुआ है। जिला अभिलेख के अनुसार इसका क्षेत्रफल लगभग 1578 वर्ग मील है जो यहां की प्रसिद्ध नदी रामगंगा के कटाव के साथ साथ परिवर्तित होता रहा है। यह प्रदेश के कुल 6 जनपदों से घिरा हुआ है। इसके पूर्व में शाहजहांपुर, पूर्व उत्तर में पीलीभीत, उत्तर में नैनीताल, पश्चिम में रामपुर दक्षिण में मुरादाबाद व बदायूं जनपद स्थित है। ऐतिहासिक दृष्टि से बरेली जनपद उत्तर प्रदेश का एक महत्वपूर्ण जनपद है। बरेली जनपद की स्थापना के विषय में विभिन्न इतिहासकारों तथा शिक्षाविदों के भिन्न-भिन्न मत है। प्रथम मतानुसार इस क्षेत्रपर सन् 1500 ई. में कठेरिया राजपूत राजा जगत सिंह का शासन था। राजा जगत सिंह ने सर्वप्रथम जगतपुर नामक एक छोटे से ग्राम की स्थापना की जो आज भी बरेली नगर का एक प्रसिद्ध मोहल्ला है। इनके पश्चात इनहीं के दो पुत्र बासुदेव और बरलदेव ने सन् 1537 ई. में बास बरेली नामक एक मोहल्ला स्थापित किया तथा एक किले का भी शिलान्यास कराया। यह मोहल्ला आज भी बरेली नगर में पुराना शहर के नाम से जाना जाता है जिसमें किले के अवशेष दिखाई देते हैं। द्वितीय मतानुसार राजा जगत सिंह एक बरहेला राजपूत था जिसके आसुदेव और नागदेव दो पुत्र थे। वासुदेव एक योग्य व्यक्ति था जिसने 1550 ई. में बास बरेली नामक किला अपने पिता जगतसिंह द्वारा स्थापित जगतपुर ग्राम में बनवाया। इसे आज भी मुहल्ला कोट के नाम से पुकारते हैं। मुगल सम्राट अकबर के शासन काल 1556 ई. से 1605 ई. में कठेरिया राजपूत वासुदेव और बरलदेव ने मुगल साम्राज्य के विरुद्ध संगठित होकर विद्रोह कर दिया। अकबर ने अलमास अली खां के नेतृत्व में एक विशाल सेना राजपूतों से युद्ध करने बरेली क्षेत्र में भेजी।

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दोनों सेनाओं में भीषण युद्ध हुआ। परिणामस्वरूप युद्ध में राजपूत योद्धा वासुदेव वीरगति को प्राप्त हुए और बरेली पर मुगलों का अधिकार हो गया। सन् 1568 ई. में बरेली को बदायूँ प्रांत में मिला दिया गया। कुछ वर्षों के पश्चात बरेली को एक स्वतंत्र कमिश्नरी घोषित कर दिया गया। यदि बांस बरेली क्षेत्र के पूर्व इतिहास पर दृष्टिपात किया जाये तो इस क्षेत्र एक रोचक इतिहास प्राप्त होता है। बरेली क्षेत्र महाभारत काल में पांचाल के नाम से जाना जाता था। जो महाराजा दु्रपद की राजधानी थी। यह क्षेत्र हिमाचल पर्वत से चम्बल की घाटी तक फैला हुआ था। रामगंगा नदी ने पांचाल क्षेत्र को दो भागों में विभक्त कर दिया जिन्हें उत्तरी पांचाल और दक्षिणी पांचाल की राजधानी अहिचक्षेत्र से अलग हो गया। सैकड़ो वर्षों के उपरान्त रामंगा नदी के उत्तरी तथा अवध के पश्चिमी क्षेत्र को कटेहर नाम से जाना जाने लगा जो सन् 1750 ई. तक इसी कटेहर नाम से पुकारा जाता रहा। कुछ समय के बाद इसी क्षेत्र को रूहेलखण्ड का नाम दे दिया गया और बरेली इस क्षेत्र का मुख्यालय बना दिया गया। प्राचीन युग के बौद्धकाल में संपूर्ण पांचाल क्षेत्र बौद्ध सम्राट अच्युत के अधिकार में आ गया और तब से इस क्षेत्र की राजधानी अहिचक्षेत्र बन गई। सम्राट अच्युत के पश्चात इस क्षेत्र पर गुप्त, बर्धन आदि वंशों के शासन रह…

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