बरेली की समृद्ध विरासत का पुष्प गुच्छ- निर्भय सक्सेना की “कलम बरेली-3”

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बरेली। निर्भय सक्सेना जाने-माने पत्रकार हैं। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी हैं। वे प्रखर पत्रकार, साहित्यकार और समाजसेवी हैं। उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता है कि वे बहुत ही सहयोगी प्रवृत्ति के और बेहतरीन इंसान हैं। वे बरेली के पहले ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने बरेली की समृद्ध विरासत को अपने लेखन का केन्द्र बनाया है। उनकी दो कृतियाँ, पाठकों के मध्य बहुत लोकप्रिय हुई हैं और सराही गयी हैं।
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कलम बरेली पार्ट-3 निर्भय सक्सेना की तीसरी कृति है। सद्यः प्रकाशित उनकी यह कृति बरेली की समृद्ध सांस्कृतिक की सामाजिक विरासत का पुष्प गुच्छ है। इसे बरेली का ऐतिहासिक दस्तावेज कहा जाए तो इसमें बरेली के तत्कालीन समाज का प्रतिबिम्ब झलकता है। लेखक ने समाज के विविध पहलुओं पर अपनी लेखनी चलाई है और उनका सजीव चित्रण किया है। लेखक लम्बे समय तक पत्रकार रहे हैं। इसलिए उनकी लेखनी में धार और लेखन में पैनापन है। लेखक ने अपनी कृति में देश के स्वतंत्रता समर में बरेली के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों द्वारा दिए जाने का सजीव चित्रण किया है। उनके अनुसार बरेली 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का एक प्रमुख केन्द्र रहा। यहां के जी. आई. सी. के मैदान पर नाना फड़नवीस, तात्या टोपे, कुंवरसिंह, राजा जगत सिंह की सेना के कैम्प रहे। बड़े-बड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने यहां जनसभाएँ कीं और लोगों से देश की आजादी के लिए आगे आने की अपील की।

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लेखक के अनुसार 1857 की क्रान्ति के चार प्रमुख केन्द्र दिल्ली, कानपुर,मेरठ और बरेली थे। बरेली की क्रान्ति के नायक नवाब खान बहादुर खान थे। रुहेला सरदार हाफिज रहमत खां ने बरेली की क्रान्ति में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 31 मई 1857 को खान बहादुर खान के नेतृत्व में बरेली में आजादी का बिगुल फूंक दिया गया। बरेली की छावनी से तोप की आवाज के इशारे से क्रान्ति की घोषणा की गई। खान बहादुर खान के नेतृत्व में क्रान्तिकारियों ने कोतवाली की ओर कूच किया। कोतवाली में खान बहादुर खान को गद्दी पर बैठाया गया और दिल्ली के बादशाह बहादुर शाह के अधीन स्वतंत्र रोहेलखण्ड की घोषणा की गई। नवाब खान बहादुर खान ने बरेली का शासन प्रबन्ध बड़ी कुशलता के साथ संभाल लिया। नए सैनिकों की भर्ती की गई। उनकी सेना में 25 हजार पैदल और 4618 घुड़सवार शामिल थे। बरेली के बाद धीरे-धीरे उन्होंने पूरे रोहेलखण्ड को अंग्रेजों की दासता से मुक्त करा लिया। लगभग एक वर्ष तक पूरा रोहेलखण्ड अंग्रेजों की दासता से मुक्त रहा। यद्यपि 1857 की क्रान्ति कुछ विषेष कारणों से असफल रही मगर रोहेलखण्ड पर दोबारा कब्जा करने को अंग्रेजी सेना को नाको चने चबाने पड़े। इतिहासकारों के अनुसार 1857 में हुई क्रान्ति में बरेली की क्रान्ति में बरेली क्रान्ति सबसे संगठित और योजनाबद्ध थी। बाद में महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाए गए स्वराज आन्दोलन में बरेली के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। महात्मा गांधी, पं. जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री एवं गोविन्द बल्लभ कई बार बरेली आए और लोगों से देश की आजादी में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने की अपील की। लोग देश की आजादी के लिए सिर पर कफन बांधकर घर से निकल पड़े। बरेली के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में पी. सी. आजाद, धर्मदत्त वैद्य, श्योराज बहादुर, फूलराज सिंह, बृजराज सिंह, शान्ति शरण विद्यार्थी, शीला देवी, कृपा देवी, बाबूराम सक्सेना, श्योराज सिंह, पृथ्वीराज सिंह, नौरंग लाल (एडवोकेट), राम चंद्र सेवक, महानन्द सेवक आदि के नाम प्रमुख हैं। इन्होंने देश की स्वतंत्रता में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है।

पुस्तक में अधिकांश स्वतंत्रता सेनानियों के भी नाम हैं। लेखक ने बरेली की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पर भी अपनी लेखनी चलाई है। कृति के अनुसार आर्य समाज ने देशभर में स्वतंत्रता एवं शिक्षा की अलख जगाई। बरेली की विदुषी डा. सावित्री देवी ने आर्यसमाज के प्रचार-प्रसार में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे बरेली की पहली विदुषी थीं जो पांच विषयों में आचार्य और वेदाचार्य थीं। उन्होंने महिला शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया। आगे चलकर उनकी शिष्याओं ने पूरे देश में आर्य समाज की कीर्ति पताका को फहराया। बरेली के प्रमुख शिक्षण संस्थानों का उल्लेख करते हुए लेखक ने कलम बरेली की-3 में बताया है कि बरेली वर्तमान समय में शिक्षा एवं चिकित्सा का हब बनकर उभरी है। यहां आस-पास के लगभग दस जिलों के छात्र इंजीनियरिंग एवं मेडिकल शिक्षा के अध्ययन के लिए बरेली आते हैं।
बरेली में विश्व प्रसिद्ध भारतीय पशु अनुसंधान संस्थान सी. ए.आर.आई., एम. जे. पी. रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय, इन्वर्टिस विश्वविद्यालय, बरेली इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी है। बरेली में श्री राममूर्ति मेडिकल कॉलेज, रोहेलखण्ड मेडिकल कॉलेज राजश्री मेडिकल कॉलेज, गंगाशील आयुर्वेद मेडिकल कालेज तथा रोहेलखण्ड मेडिकल कॉलेज स्थित हैं जिनमें हजारों छात्र-छात्राएं मेडिकल शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। जिले में एक दर्जन से अधिक पैरा मेडिकल कॉलेज हैं जहां विभिन्न मेडिकल कोर्स संचालित हैं। बरेली में दो दर्जन से अधिक इंजीनियरिंग कॉलेज मैनेजमेंट कॉलेज और दर्जनों जी. टी. आई. हैं। जिले में एक दर्जन से अधिक शासकीय एवं अशासकीय महाविद्यालय हैं और चार सौ से अधिक इंटर कालेज हैं।
लेखक के अनुसार बरेली अपनी गंगा-जमुनी संस्कृति के लिए जाना जाता है। यहां की साझा विरासत और साझा शहादत है। यह अदब और तहजीब का बरेली शहर और अपने अमन-चैन के लिए जाना जाता है। यह नाथ नगरी कहलाती है और वर्तमान प्रदेश सरकार बरेली में नाथ कारीडोर बनाने जा रही है। दूसरी ओर यहां आला हज़रत का उर्स भी होता है। जिसमें देश-विदेश के लाखों जायरीन भाग लेते हैं। सभी धर्मों के लोग एक दूसरे की रवायतों एवं परम्पराओं का सम्मान करते हैं। लेखक ने “कलम बरेली की- 3” में समाज के विविध पहलुओं का बहुत ही तार्किक एवं तथ्यपूर्ण विष्लेषण किया है जिससे कृति की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। उनकी यह कृति बरेली का एक प्रमाणिक ऐतिहासिक दस्तावेज है जो शोध छात्रों के लिए बहुत उपयोगी होगा। कृति की भाषा मानक स्तर की है। भाषा में वागविलास नहीं है। लेखक ने कृति को व्याकरण की जटिलता एवं भाषा की दुरुहता से बचाने का सफल प्रयास किया है जिससे आम पाठक भी उसे आसानी से समझ सकता है और उसे हृदयंगम कर सकता है।
लेखक ने कृति में वर्णनात्मक शैली का प्रयोग किया है जिससे इसकी रोचकता और बढ़ गई है। कथ्य और तथ्य की दृष्टि से निर्भय सक्सेना द्वारा लिखित “कलम बरेली की-3” एक उत्कृष्ट कृति है। इसलिए साहित्य जगत में उनकी इस कृति का स्वागत होना चाहिए। मुझे पूरा विश्ववास है “कलम बरेली की- 3” पाठकों के मध्य बहुत लोकप्रिय होगी और उनके द्वारा खूब सराही जाएगी।

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