बदायूं। मृत्युञ्जय शब्दों का योद्धा क्रूर-काल से छला गया । सरस्वती पूजन के पहले मुख्य पुजारी चला गया । जो माता सितवसना के चिन्तन में आठोंयाम रहा । तन से, मन से, धन से भारत माँ के लिये प्रणाम रहा । राष्ट्रवाद का प्रखर तूर्य जिसने अविराम बजाया था । जो जागरण काव्य का ले संदेश धरा पर आया था । जिस वाणी का चमत्कार दिनकर की किरणों ने देखा । श्याम नारायण और मैथिली के आचरणों ने देखा । सोहनलाल द्विवेदी को जिसकी हुंकार सुनाई दी । पूज्य निराला को भी पौरुष की ललकार सुनाई दी । ऐसे कवियों का मन्दिर अब सूना-सूना लगता है । सच पूछो तो मरघट का ही एक नमूना लगता है । जो साहित्यिक भवन बनाने में अपना तन गला गया । सरस्वती पूजन के पहले मुख्य पुजारी चला गया ।