14 जनवरी को मकर संक्रांति पर पुण्यकाल, ग्रहों के योग से बन रहा अनोखा संयोग

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वाराणसी। पूर्वराशिं परित्यज्य उत्तरां याति भास्कर:।

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                           स राशि: संड्क्रामाख्या स्यान्मासर्त्वायनहायने।।

अर्थात् जब सूर्य एक राशि का छोड़कर दूसरी राशि में प्रवेश करता है तो इसे संक्रान्ति कहते हैं। इस नियम के अनुसार सूर्य जब धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है तो मकर संक्रांति होती है। वैसे तो सभी ग्रहों की संक्रांतिया होती हैं परंतु उन सभी में सूर्य की संक्रांति विशेष फलदायक होती है इसीलिए हमारे शास्त्रों में सूर्य की संक्रांति और उनमें भी मकर संक्रांति को विशेष महत्व दिया गया है क्योंकि धर्मशास्त्रीय नियमानुसार मकर संक्रांति काल में स्नान, जप, दान, होम इत्यादि धार्मिक कृत्यों से सामान्य की अपेक्षा कई गुने फल की प्राप्ति होती है परंतु संक्रांति का काल इतना सूक्ष्म होता है कि उस काल में कुछ भी कृत्य कर पाना संभव नहीं होता अतः उसकी फल प्राप्ति के लिए आचार्यों ने पुण्य काल घटी का आदेश किया है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभागाध्यक्ष प्रो. विनय कुमार पाण्डेय के अनुसार सामान्यतया सभी संक्रांतियों में संक्राति से पहले और बाद कि 16-16 अथवा 20- 20 घटियां  पुण्यकाल की होती हैं परंतु धर्म शास्त्रीय वचनानुसार मकर संक्रांति में संक्रांति काल के बाद कि 20 अथवा 40 घटी पुण्यकाल की होती है। मकर संक्रांति का यह पर्व लगभग संपूर्ण भारतवर्ष में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है जैसे उत्तर भारत में खिचड़ी, दक्षिण भारत में पोंगल, पंजाब और सिंध प्रदेश में लोहड़ी, गुजरात मे उत्तरायण, बंगाल में  पौष संक्रांति, महाराष्ट्र और हरियाणा में माघी संक्रांति, कर्नाटक में सुग्गी हब्बा, ओडिशा में मकर चौल, असम में बिहू और कश्मीर मर शिशिर संक्रांत इसीलिए मकर – संक्रान्ति का पर्व का हमारे देश में विशेष महत्व है। 

मकर संक्रान्ति का काल देवताओं की मध्यरात्रि का काल होता है और इसके बाद देवता अपने दिन की ओर उन्मुख होने लगते हैं। इसिलए संहिता ग्रंथो में दिनोन्मुखत्वमेव दिनम कहकर इसे देवताओं का दिन कहा गया है।

संक्रांति का उचित समय

इस वर्ष संक्रांति के काल को लेकर समाज में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई है परंतु भारतीय ज्योतिष शास्त्र की पारंपरिक ग्रंथों में सबसे आधुनिकतम परन्तु पारंपरिक ग्रंथ केतकी ग्रह गणित के अनुसार संक्रांति का काल 8:18 बजे प्रातः के आसन्न सिद्ध हो रहा है। अतः सनातन धर्मावलंबियों के लिए ज्योतिष शास्त्र के पारंपरिक एवं सर्वमान्य शुद्धतम ग्रंथ केतकी ग्रह गणित के अनुसार प्राप्त 8:18 बजे के आसन्न की संक्रांति काल को ही आधार मानकर धर्म आचरण करना उपयुक्त होगा। 14 जनवरी 2021 को संक्रांति का पर्व प्रातः 8:18 बजे से आरंभ कर सायं काल पर्यंत मनाया जाएगा। इस वर्ष 2021 में 14 जनवरी को प्रातः लगभग 8:18 बजे सूर्य के मकर राशि में आने से 14 जनवरी को मकर सक्रांति पर्व मनाया जाएगा तथा इसका पुण्यकाल संक्राति काल से आरम्भ होकर सूर्यास्त काल तक रहेगा।

दान पुण्‍य का काल

मकर संक्रांति के दिन श्रद्धा अनुसार जरूरतमंद लोगों को दान दिया जा सकता है। इस दिन स्नान, दान, जप, तप, श्राद्ध, तथा अनुष्ठान आदि का अत्यधिक महत्व है। इस अवसर पर किया गया दान सौ गुना होकर प्राप्त होता है। दान वस्तुओं के क्रम में तिल , चावल, उड़द की दाल, कम्बल, उपानह, गर्म कपड़े, अग्नि, आदि दान करने तथा गरीबों को खिचड़ी खिलाने से अनन्त पूण्य की प्राप्ति होती है। धर्मसिन्धु में कहा गया है कि-

रविसंक्रमणे प्राप्ते न स्नायाद्यस्तु मानवः।

सप्तजन्मनि रोगी स्यान्निर्धनश्चैव जायते।।

अर्थात् मकर-संक्रान्ति के दिन स्नान न करने वाला व्यक्ति जन्मजन्मान्तर में रोगी तथा निर्धन होता है। इस साल मकर संक्रांति पर पांच ग्रहों का विशेष योग भी बनेगा। इस बार संक्रांति का नाम मंदा है। जो कि शेर पर सवार होकर मकर में प्रवेश कर रही है। ये देव जाति की है। शरीर पर कस्तूरी का लेप, सफेद रंग के कपड़े पहने हुए, नाग केसर पुष्प की माला और हाथ में भुशुंडि शस्त्र लिए, सोने के बर्तन में भोजन करती हुई है।

गुरुवार को संक्रांति होना शुभ  

गुरुवार बृहस्पति देव का दिन है। ज्योतिष ग्रंथों में इसे शुभ दिन माना जाता है। इसलिए इस दिन उत्तरायण होना यानी सूर्य का राशि बदलना बहुत ही शुभ होता है। यह संक्रांति गुरुवार को पड़ रही है जिससे महंगाई के कुछ कम होने के आसार हैं। ज्योतिष ग्रंथों में बताया गया है जब सूर्य के राशि बदलता है उस समय संक्रांति वाली कुंडली बनाई जाती है। जिससे अगले 30 दिनों का राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक भविष्यफल निकाला जा सकता है। इस बार सूर्य के राशि बदलते ही मकर राशि में सूर्य के साथ चंद्रमा, बुध, गुरु और शनि होने से पंचग्रही योग बनेगा। ग्रहों की यह युति बड़े राजनीतिक और सामाजिक बदलाव लाने का ज्योतिषीय संकेत दे रही है। मयूरचित्रकम् में कहा गया है कि- पंचग्रही घ्नन्ति चतुष्पदानां अर्थात्‌ पंचग्रही योग पशुओं के लिये हानिकारक है । पूर्वाह्न में संक्रान्ति का फल ज्योतिर्निबन्ध ग्रन्थ के अनुसार पूर्वाह्ने पीडयेद्भूपान् अर्थात् जब पूर्वाह्न में सूर्य की  संक्रान्ति होती है तो राजाओं को पीड़ा देने वाली होती है। प्रशासनिक फेरबदल होने की सम्भावना बन रही है । 

संक्रांति का फल

इस वर्ष के मकर संक्रान्ति के सामूहिक फल पर विचार करें तो- कुछ सरकारी अधिकारियों के लिए स्थितियां कुछ विपरीत हो सकती है। इन सबके प्रभाव से 15 फरवरी तक देश में असामाजिकता बढ़ सकती है। आपराधिक गतिविधियां  और वारदातें बढ़ सकती हैं। लेकिन लोगों की सेहत में सुधार होगा। महंगाई कम होने की संभावना है। अन्य देशों से भारत के संबंध मजबूत होंगे। देश में अनाज भण्डारण भी बढ़ेगा। धार्मिक क्षेत्र, न्याय व शिक्षा क्षेत्रों में अति संघर्ष, असन्तोष और आन्दोलन प्रदर्शन होंगे। भ्रष्टाचार की वृद्धि और कुछ नेताओं को सत्ता से बाहर किया जायेगा। आन्दोलन, प्रदर्शन और राजनैतिक दलों में विशेष विरोध होंगे। विश्व पटल पर भारत का प्रभाव बढ़ेगा। मकर संक्रान्ति पर्व महोत्सव का रूप धारण कर चुका है। इस दिन भारतवर्ष में पतंग उड़ाने का कार्य होता है। मकर संक्रान्ति के दिन भगवान शिव का घी से अभिषेक करने का विशेष फल होता है। स्वर्ण दान तथा तिल से भरे पात्र का दान करना अक्षय फल को देता है।

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