केबी हिंदी सेवा न्यास की 116वीं मासिक काव्य गोष्ठी हुई,कवियों ने काव्य पाठ कर सिस्टम पर किए प्रहार
बिसौली। के. बी. हिंदी सेवा न्यास (पंजी.)की 116वीं मासिक काव्य गोष्ठी का आयोजन न्यास के कार्यालय पर किया गया।
अध्यक्षता बदायूँ से पधारे कवि राजवीर सिंह ‘तरंग’ ने की. मुख्य अतिथि एन.पी.पाठक ‘आभाषित’ रहे।संचालन न्यास के सह सचिव विजय कुमार सक्सेना ‘विजय’ ने किया।
शुभआरम्भ मंचासीन अतिथियों सहित न्यास अध्यक्ष डॉ.सतीश चन्द्र शर्मा ‘सुधांशु’ द्वारा सामूहिक रूप से दीप प्रज्वलन एवं माँ वाणी को पुष्प अर्पित कर किया गया।
वाणी वंदना बदायूँ से पधारे कवि राजवीर सिंह ‘तरंग’ ने की।
श्रीपाल शर्मा ‘शमन’ ने सुनाया-
तार-तार होती मानवता, कब से देख रहे हैं।
शर्मा शक्ति से बना महल, गिरता देख रहे हैं।
विजय कुमार सक्सेना ‘विजय’ ने कहा –
मंदिर मस्जिद ढूंँढता, क्या नादाँ इंसान।
मात पिता के रूप में,घर- घर है भगवान।।
राजवीर सिंह ‘तरंग’ (बदायूँ) ने सुनाया-
धर्म का पालन करके राघव क्या क्या खोये हैं।
मन को तो वनवास दिया है केवल तन को ढोए हैं।
न्यास अध्यक्ष डॉ. सुधांशु ने सामयिक परिप्रेक्ष्य में तंज किया-
सरकारी यह कथ्य है, भरे हुए भंडार।
लम्बी-लम्बी दिख रहीं,फिर क्यों भला कतार।।
एन.पी.पाठक ‘आभाषित’ ने कहा-
इक किनारे से चलकर किनारे लगे।
जाने कब कौन किसके सहारे लगे।
राजेंद्र नाथ (चंदौसी) ने कहा-
पैसे से रुपया बने, रूपये का सब खेल।
ज़ब भी रुपया चुका तो बिगड़ा सारा खेल।
अक्षांश वत्स भार्गव ने सुनाया-
सबसे बढ़िया है उपहार।
दादू और पोते का प्यार।।
इसके अतिरिक्त भक्ति शर्मा, रुद्रांश वत्स भार्गव ने भी काव्य पाठ किया। इस अवसर पर के. बी हिंदी सेवा न्यास हे महासचिव आशुतोष शर्मा,सचिव आशीष शर्मा, न्यास के सदस्य हरस्वरूप शर्मा, गिरीश चन्द्र शर्मा आदि उपस्थित रहे। बदायूँ से पधारे कवि राजवीर सिंह ‘तरंग’ का न्यास अध्यक्ष डॉ. सतीश चन्द्र शर्मा ‘सुधांशु’ ने न्यास की ऒर से अंगवस्त्र पहनाकर तथा न्यास की पत्रिका/पुस्तकें उपहार स्वरूप प्रदान कर सम्मान किया। अंत में अध्यक्षीय उदबोधन के साथ गोष्ठी का समापन किया गया। न्यास महासचिव आशुतोष शर्मा ने सभी का आभार व्यक्त किया।














































































