नाटक “तिल का ताड़” का मंचन,अफवाह, दिखावे और झूठ से बचने का संदेश

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बरेली। एसआरएमएस रिद्धिमा के सभागार में शाम शंकर शेष लिखित हास्य व्यंग्य पर आधारित नाटक “तिल का ताड़” का मंचन हुआ। विनायक कुमार श्रीवास्तव निर्देशित “तिल का ताड़” हमारे समाज में व्याप्त उस प्रवृत्ति पर सशक्त व्यंग्य है, जहां छोटी-सी बात को बढ़ा- चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है। नाटक दिखाता है कि कैसे अफवाहें, अतिश्योक्ति और अहंकार व्यक्तिगत संबंधों से लेकर सामाजिक ढांचे तक को प्रभावित करता है।नाटक हास्य और व्यंग्य के माध्यम से गंभीर सामाजिक प्रश्न उठाता है। संवादों की चुटीलापन और परिस्थितिजन्य हास्य दर्शकों को हंसाते हुए सोचने पर मजबूर करता है। निर्देशक विनायक ने नाटक के मूल कथ्य को बनाए रखते हुए उसे समकालीन संदर्भों से जोड़ा है, जिससे यह प्रस्तुति आज के दर्शक के लिए और अधिक प्रासंगिक बन जाती है। “तिल का ताड़” न केवल मनोरंजन करता है, बल्कि समाज को आईना दिखाने का भी काम करता है। नाटक का अहम पात्र प्राण नाथ है, जो धन्नामल से झूठ बोल कर एक साल से उसके मकान में किराये पर रह रहा है। अविवाहित प्राणनाथ ने धन्नामल से खुद को शादीशुदा बता और पत्नी के गांव में रहने की झूठी जानकारी देकर उसका मकान किराए पर लिया है। एक दिन धन्नामल प्राणनाथ को धमकी देता है कि वो अपनी पत्नी को गांव से ले आये, नहीं तो उसका मकान खाली करे। परेशान होकर प्राण नाथ अपने दोस्त पतित पावन को एक औरत को एक दो दिन के लिए लाने को कहता है। उसी दिन प्राणनाथ के घर के बाहर कुछ लोग एक लड़की मंजू को परेशान कर रहे हैं तो वो उस लड़की मंजू को अपने घर ले आता है और मंजू से उसकी पत्नी होने नाटक करने की प्रार्थना करता है। बहुत कहने पर मंजू मान जाती है। धन्नामल बहुत खुश होता है। किसी दिन मौका निकल वो मंजू से पूछता है उसका देवर यानि प्राणनाथ का भाई है तो उसकी शादी मेरी बेटी करा दे। मंजू को तो पता नहीं था कि प्राण का कोई भाई नहीं है। प्राण का एक और दोस्त ब्रह्मचारी है। जो महिलाओं से बहुत चिढ़ता है और सभी शादी न करे इसके लिए भाषण देता रहता है। इसी बीच बनारसी दास आता है वो प्राणनाथ की शादी अपनी बेटी रंजना से करना चाहता है। क्योंकि रंजना और प्राणनाथ प्रेम करते हैं। जब धन्नामल की मुलाकात बनारसी दास से होती है, दोनों एक दूसरे को प्राणनाथ के पिता समझते है। इन्हीं सब झूट के बीच प्राणनाथ का असली पिता गयाप्रसाद आ जाता है। तब स्थिति और जटिल हो जाती है जब पता चलता की मंजू पहले ही विवाहित है। तभी मंजू का पति अजय आ जाता है। यहीं पर झूठ का पूरा खेल खत्म होता है। नाटक में प्राणनाथ का किरदार पंकज कुकरेती, मंजू का शाहजीन खान, पतित पावन का अंशुल चौहान, ब्रह्मचारी कि शिवम यादव, धन्नामल का मनोज शर्मा, बनारसी दास का राजकिशोर पाठक, अजय का गौरव कार्की, गयाप्रसाद का किरदार नाटक के निर्देशक विनायक श्रीवास्तव ने निभाया। संगीत संचालन गौरव कार्की, साउंड संचालन अरुण सिंह एवं जाफर और प्रकाश संचालन जसवंत सिंह ने किया। इस अवसर पर एसआरएमएस ट्रस्ट के संस्थापक एवं चैयरमेन देव मूर्ति , आदित्य मूर्ति , आशा मूर्ति , ऋचा मूर्ति , देविशा मूर्ति, उषा गुप्ता, सुभाष मेहरा, डा. प्रभाकर गुप्ता, डा. अनुज कुमार, डा. शैलेश सक्सेना, डा. आशीष कुमार, डा. रीता शर्मा और शहर के गणमान्य लोग मौजूद रहे।

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