50 लोकतंत्र सेनानियों को शॉल, माला व प्रशस्ति पत्र देकर किया सम्मान

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बरेली। भारतीय जनता पार्टी बरेली के द्वारा रोहिलखंड डेंटल कॉलेज के सभागार में आपातकाल के काले अध्याय का 50वां वर्ष होने पर सगोष्ठी व लोकतंत्र रक्षक सेनानियों का सम्मान कार्यक्रम आयोजित किया गया। जिसमे मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश सरकार के वित्त मंत्री सुरेश खन्ना रहे। कार्यक्रम में लोकतंत्र रक्षक सेनानी व स्कूल व कॉलेज के छात्र व छात्राएं उपस्थित रहे।
मुख्य अतिथि सुरेश खन्ना ने एक पेड़ माँ के नाम अभियान के तहत मौलश्री का वृक्ष लगाया उसके उपरांत आपातकाल पर लगी प्रदर्शनी का फीता काटकर अवलोकन किया। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि सुरेश खन्ना ने कहा कि 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जिस प्रकार से देश में आपातकाल लगाने का घोर व अमानवीय कृत्य किया। जिसकी जितनी निंदा की जाए उतनी कम है, आज उनके पोते जो संविधान प्रतिका लेकर लोकतंत्र की दुहाई दे रहे हैं। उनके पूर्वजों ने देश को गहरी खाई में ढकेलने का कार्य किया। आज देश का नेतृत्व एक गरीब पिछड़े समाज से आने वाले तथा चाय बेचने वाला देश का नेतृत्व पिछले 11 वर्षों से कर रहा है। आज देश दुनिया की सबसे तेज चौथी अर्थव्यवस्था बना है और बहुत जल्द तीसरी अर्थव्यवस्था बनेगा। उन्होंने कहा 25 जून 1975 की आधी रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ‘आंतरिक अशंतिं का बहाना बनाकर भारत पर आपातकाल थोप दिया। यह निर्णय किसी युद्ध या बिद्रोह के कारण नहीं, बत्कि अपने चुनाव को रद्द किए जाने और सता बचाने की हताशा में लिया गया था। कांग्रेस पार्टी ने इस काले अध्याय में न केवल लोकतांत्रिक संस्थाओं को रौंदा, बल्कि प्रेस की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की निष्पक्षता और नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कुचलकर यह स्पष्ट कर दिया कि जब-जब उनकी सत्ता संकट में होती है, वे सविधान और देश की आत्मा को ताक पर रखने से पीछे नहीं हटते। आज 50 वर्ष बाद भी कांग्रेस उसी मानसिकता के साथ चल रही है आज भी सिर्फ तरीको का बदलाव हुआ है नीयत आज भी वैसी ही तानाशाही वाली है। मार्च 1971 में लोकसभा चुनाव में भारी बहुमत से जीतने के बावजूद इंदिरा गांधी की वैधानिकता को चुनौती मिली। उनके विपक्षी उम्मीदवार राज नारायण ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनाव को भ्रष्ट आचरण और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के आधार पर चुनौती दी। देश की अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुजर रही थी, जिससे जनता में असंतोष बढ़ता जा रहा था। देश पहले से ही आर्थिक बदहाली, महंगाई और खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था। बिहार और गुजरात में छात्रों के नेतृत्व में नव निर्माण आंदोलन खड़ा हो चुका था। 8 मई 1974 को जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में ऐतिहासिक रेल हड़ताल ने पूरे देश को जकड़ लिया। इस आंदोलन को रोकने के लिए 1974 में गुजरात में इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति शासन लगा दिया। यही राष्ट्रपति शासन 1975 में लगने वाले आपातकाल की एक शुरुआत था। इसके साथ ही बिहार में कांग्रेस सरकार के खिलाफ असंतोष बढ़ने लगा और 1975 में हुए गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। 12 जून 1975 को कोर्ट ने इंदिरा गांधी को चुनाव में दोषी ठहराया और उन्हें 6 वर्षों तक किसी भी निर्वाचित पद पर रहने से अयोग्य करार दिया। इसके बाद राजनीतिक अस्थिरता तेजी से बढ़ी, जिससे घबराकर इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को ‘आंतरिक अशांति’ का हवाला देकर राष्ट्रपति से आपातकाल लगा दिया। रातों रात प्रेस की बिजली काटी गई, नेताओं को बंदी बनाया गया और 26 जून की सुबह देश को तानाशाही की सूचना रेडियो के माध्यम से दी गई। संविधान के अनुच्छेद 352 का दुरुपयोग कर लोकतंत्र को रौंदा गया, संसद और न्यायपालिका को अपंग बना दिया गया। यह सिलसिला किसी युद्ध या बाहरी हमले से नहीं, बल्कि एक व्यक्ति के कुर्सी खोने के भय से शुरू हुआ और पूरे राष्ट्र को मौलिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया।
1975 में आपातकाल की घोषणा कोई राष्ट्रीय संकट का नतीजा नहीं थी, बल्कि यह एक डरी हुई प्रधानमंत्री की सत्ता बचाने की रणनीति थी, जिसे न्यायपालिका से मिली चुनौती से बौखला कर थोपा गया। इंदिरा गांधी ने ‘आंतरिक अशांति’ की आड़ लेकर अनुच्छेद 352 का दुरुपयोग किया, जबकि न उस समय कोई युद्ध की स्थिति थी,न विद्रोह और न ही कोई बाहरी आक्रमण हुआ, यह सिर्फ इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा इंदिरा की चुनावी सदस्यता रद्द करने के निर्णय को निष्क्रिय करने और अपनी कुर्सी को बचाने की जिद थी। जिस संविधान की शपथ लेकर इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी थीं, उसी संविधान की आत्मा को कुचलते हुए उन्होंने लोकतंत्र को एक झटके में तानाशाही में बदल दिया और चुनाव में दोषी ठहराए जाने के नैतिकता से इस्तीफा देने के बजाय पूरी व्यवस्था को ही कठपुतली बनाकर रखने का षड्यंत्र रच दिया। इदिरा गांधी ने मीसा जैसे काले कानूनों के जरिए एक लाख से अधिक नागरिकों को बिना किसी मुकदमे के जेलों में ठूंस दिया था। लोकतंत्र सेनानी वीरेंद्र अटल ने कहा कि 25 जून तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने देश मे लोकतंत्र की हत्या की। मानवधिकारों का हनन किया। नागरिकों एवं राजनीतिक कार्यकर्ताओं को यातनाएं दी। जिसको पूरा देश आज भी “काला दिवस” के रूप में मानता है।
कांग्रेस सरकार ने कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका सहित लोकतंत्र के तीनों स्तंभों को बंधक बनाकर सत्ता के आगे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। प्रेस की स्वतन्त्रता पर ऐंसा हमला हुआ कि बडे बडे अखबारों की बिजली काट दी गई, सेंसरशिप लगाई गई और पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया। लोकतंत्र सेनानी राजेन्द्र बहादुर चौधरी ने कहा कि कांग्रेस की तानाशाही का विरोध केवल राजनीतिक नहीं था, यह भारत की आत्मा की रक्षा का आंदोलन था जिसमें राष्ट्रवादियों ने जान की बाजी लगाई थी। कांग्रेस ने लोकतंत्र के साथ इतना बढ़ा विश्वासधात किया लेकिन आज भी वह अपने किए के लिए न तो माफी मांगती है और न ही पछतावा प्रकट करती है। आज ‘संविधान बचाओ का नारा देने वाली कांग्रेस वही पार्टी है जिसने संविधान को सबसे पहले और सबसे गहराई से रौंदा था। आज लोकतंत्र रक्षक सेनानी वीरेंद्र अटल, राजेन्द्र बहादुर चौधरी, सतीश शर्मा, लेखपाल सिंह, कन्हैयालाल मिश्र, बाबूराम, झाझन लाल, महेश चंद्र सक्सेना, सुमंत माहेश्वरी, सोहनलाल, भीमसेन, जगदीश प्रसाद, भानुमति, गंगा देवी, मंगला देवी, सुंदरलाल, रामवती, राजेन्द्र पाल सिंह, उषा उपाध्याय, सरला, प्रवीण कुरेशी सहित 50 लोकतंत्र सेनानियों को शॉल, माला व प्रशस्ति पत्र देकर उनका सम्मान किया गया। इस अवसर पर उत्तर प्रदेश सरकार के वित्त मंत्री सुरेश खन्ना, वन मंत्री डॉ अरुण सक्सेना, सांसद छत्रपाल सिंह गंगवार, जिला अध्य्क्ष सोमपाल शर्मा, आवला अध्य्क्ष आदेश प्रताप सिंह, महानगर अध्य्क्ष अधीर सक्सेना, विधायक संजीव अग्रवाल, डॉ श्याम बिहारीलाल, डॉ एमपी आर्य, डॉ राघवेंद्र शर्मा, महापौर उमेश गौतम, जिला पंचायत अध्य्क्ष रश्मि पटेल, क्षेत्रीय उपाध्यक्ष हर्षवर्धन आर्य, डॉ केशव अग्रवाल, अशोक अग्रवाल, नीरेंद्र सिंह राठौर, प्रभु दयाल लोधी, रविन्द्र गुर्जर, मीडिया प्रभारी अंकित माहेश्वरी, बंटी ठाकुर, निर्भय गुर्जर, विष्णु शर्मा, शिवप्रताप सिंह, अजय सक्सेना, रामनिवास मौर्य, विष्णु अग्रवाल, राहुल साहू, अभय चौहान, अंकित शुक्ला, राहुल दीक्षित, अमिताभ सिंह, तृप्ति गुप्ता, रेखा श्रीवास्तव, डॉ मनोज गुप्ता, अजय चौहान, योगेंद्र शर्मा, आदि कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

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