मुंशी प्रेम नारायण, मुखर्जी, जे बी सुमन, धर्मपाल की धमक रही बरेली पत्रकार जगत में

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बरेली। में उपजा के प्रयास से सबसे पहले बना उपजा प्रेस क्लब एवम पत्रकार कालोनी। बरेली। देश दुनिया में आज पत्रकारिता का स्वरूप ही डिजिटल ने बदल दिया है। चंद मिनटों में खबर एवम फोटो दुनिया के किसी भी भाग में पहुंच कर वायरल हो जाते हैं। पर आज से लगभग 45 या 50 वर्ष पूर्व जब समाचार फोन, टेलीग्राम या पेकेट से ही सभी संवाददाता अपने अपने संस्थान को भेजते थे । वर्ष 1990 आते आते ही बरेली भी समाचार केंद्र बन गया था। समय तक बरेली में अमर उजाला, विश्व मानव, दैनिक दिव्य प्रकाश के बाद दैनिक जागरण, दैनिक आज, नवसत्यम भी बरेली में आ चुका था। बाद में जनमोर्चा, दैनिक हिंदुस्तान, कैनविज एवम अमृत विचार भीं बरेली से प्रकाशित हुए। बरेली में यू पी जर्नलिस्ट एसोसिएशन (उपजा) के प्रयास से सबसे पहले बना उपजा प्रेस क्लब एवम पत्रकार कालोनी बनी। बरेली में 50वर्ष पूर्व पत्रकारिता जगत में 1974 के दशक में जब मैं पत्रकारिता क्षेत्र में कुछ सीखने की ललक से जब आया उस समय बरेली में बाहर के आने बाले देश-प्रदेश के समाचार पत्रों में समाचार भेजने वालों में मुंशी प्रेम नारायण सक्सेना, नरेन्द्र मोहन मुखर्जी, धर्मपाल गुप्ता, सुरेश शर्मा, ब्रिज पाल विसारिया, भार्गव जी आदि की गूंज होती थी जबकि बरेली के समाचार पत्रों में जे. बी. सुमन, राकेश कोहरवाल, नरेश वर्मा, के. के. शर्मा, बलवीर सहाय त्यागी, बलवंत राय  मिगलानी के नाम की चर्चा होती थी जिनके रोज ही समाचार तार से या समाचार पैकेट के रूप में दिल्ली जाते थे।सुरेंद बीनू सिन्हा का भी भारतीय पत्रकारिता संस्थान खुल चुका था। बरेली में अक्सर श्री जे. बी. सुमन, राकेश कोहरवाल के साथ रहकर उनके कुछ सीखने का प्रयास करता था। उसी दौरान जे. बी. सुमन ने एक दिन मुंशी प्रेम नारायण सक्सेना से मेरी भेंट कराई थी यह कहकर की ये लड़का अभी पत्रकारिता के क्षेत्र में नया है। आप भी इसे समाचारों के बारे में जानकारी देते रहा करें ताकि ये अपनी ‘दैनिक विश्व मानव’ की रिपोर्टिंग में कुछ काम कर सके। मुंशी प्रेम नारायण से भेंट के बाद उनसे कचहरी पर बंगलिया चैंबर में उनसे मुलाकात होती रही। जहां आम की बंगगिया स्थित बिस्तर पर कई वकील कुर्सी डाल कर बैठते थे और गपशप में मुंशी प्रेम नारायण सक्सेना उन्हें शहर के किस्से चटकारे लेकर सुनाते थे।

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जब मैं पहुंचता तो वह नमस्कार करने के बाद कहते थे। बैठ जाओ और कुछ समय बाद वह बसंत चाय वाले की दुकान पर ले जाकर दिन भर की सुनी सुनायी घटनाओं के बारे में बताते थे और कहते थे कि तुम फलां-फलां व्यक्ति से इस बारे में मिल लेना। इस संबंध में तुम्हें और भी काफी जानकारी मिल जायेगी ताकि तुम्हारा समाचार ढंग से बन सके। इसके बाद वह एक चाय एक समोसा खिलाकर मुझे विदा करते थे। मैं अपने कार्यों में लगकर अगले दिन प्रकाशित समाचार उन्हें अवश्य दिखाता था और वह मेरी हौसला आफजाई करते थे। मुंशी प्रेम नारायण के साथ कई बार चुनाव की कवरेज के लिए भी सूचना विभाग की जीप में पीछे बैठकर जाने का सौभाग्य मिला। होता यह था की सूचना विभाग बरेली की जीप कहीं जाने के लिए नरेन्द्र मोहन मुखर्जी के चौपुला मनोरंजन केन्द्र रोड स्थित घर पर जाती थी और सूचना अधिकारी के साथ ही मुखर्जी आगे की सीट पर काबिज हो जाते थे।  मुंशी प्रेम नारायण हम जैसे पत्रकारों को पीछे की सीट पर बैठना पड़ता था। यात्रा के दौरान मुंशी प्रेम नारायण अक्सर कोई न कोई प्रसंग चटकारे लेकर सुनाते थे जिससे वहां हास्य का वातावरण गुंजायेमान रहता था।  एक बार की बात है मोहर्रम के समय हम सभी पत्रकार क्षेत्राधिकरी नगर पुलिस के कार्यालय में क्षेत्राधिकारी डा. एच. सी. फुलेरिया से बैठे चर्चा कर रहे थे। इसी बीच नरेन्द्र मोहन मुखर्जी का वहां आना हुआ और क्षेत्राधिकारी पुलिस फुलेरिया जी को संबोधित करते हुए कहा कि मेरे काम का क्या हुआ? जिस पर फुलेरिया जी ने उत्तर दिया मोहर्रम बाद आपका काम हो जायेगा। जिसपर मुखर्जी ने कहा ‘व्हाट इस मोहर्रम’? इसके बाद मुंशी जी ने अपनी हाजिर जवाबी से कहा मुखर्जी साहब मैं मौहर्रम तो नहीं बस मौहर्रमी शक्ल के बारे में अभी आपको अवगत करा सकता हूं। आप केवल सामने टंगे आइने में अपनी शक्ल जाकर देख लें। जिस पर वहां ठहाका गूंज उठा और मुखर्जी तुरंत वहां से चले गये। मुंशी  प्रेम नारायण की खास आदत थी कि रात के किसी कार्यक्रम में जब वह जाते थे तो डिनर के समय पूछ लेते थे देख कर आओ क्या-क्या टेबिल पर खाने को लगा है।  जब मैं बताता था तो वह कहते मेरे लिए एक प्लेट में उपरोक्त आइटम लगाकर ले आओ। उस समय वरिष्ठ पत्रकारों ने  यू पी जर्नलिस्ट एसोसिएशन (उपजा) बरेली का भी गठन कर लिया जिसमें मुझे भी  सदस्य बनाया गया।  इसके बाद मुंशी प्रेम नारायण, जे.बी.सुमन, सुरेश शर्मा,राकेश कोहरवाल रामदयाल भार्गव, ब्रजपाल बिसरिया, के.के.शर्मा, दिनेश पवन आदि ने वर्ष 1975 में ‘उपजा’ का 10 वां प्रांतीय सम्मेलन बरेली में कराने का वीणा उठाया जो बरेली कालेज में हुआ। जिसमे अमर उजाला के मालिक मुरारी लाल माहेश्वरी ने भोजन आदि में बड़ा सहयोग किया था। उपजा के प्रदेश सम्मेलन में ें मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी थे। इस कमेटी के अध्यक्ष मंुशी प्रेम नारायण थे।  उपजा के इस प्रदेश सम्मेलन में प्रदेश भर के 300 पत्रकारों ने भाग लिया और सम्मेलन कराने में अमर उजाला एवं जिलाधिकारी माता प्रसाद ने काफी मदद दी। मुंशी प्रेम नारायण ने तब बरेली में ‘उपजा प्रेस क्लब’ एवं ‘प्रेस कालोनी’ बनाने की मुख्यमंत्री को ‘उपजा’ के सभी पत्रकारों की तरफ से ज्ञापन दिया गया। जिस पर बाद में भी उपजा की ओर से महामंत्री होने के नाते मैंने (निर्भय सक्सेना) भी कई बार स्मरण पत्र सरकार एवं जिला प्रशासन को दिये। जिस पर बरेली में नावल्टी चौराहे पर सिंघल लाइव्रेरी के एक हिस्से में ‘उपजा प्रेस क्लब’ और एकता नगर में 20 मकानों की पत्रकार कालोनी प्रियदर्शिनी नगर में ‘उपजा’ के कारण सबसे पहले बरेली में मूर्त रूप ले सकी। ‘उपजा’ के पास जब जगह नहीं थी तब मेरे एवं अन्य सदस्यों के घरों पर उपजा के‘ प्रेस से मिलिये’ कार्यक्रम होते थे। बाद में जिला परिषद में वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर का भी ‘प्रेस से  मिलिए’ कार्यक्रम रखा गया। मुंशी प्रेम नारायण के सहायक के रूप में भैरव दत्त भट्ट ‘दैनिक उत्तर उजाला’ के प्रतिनिधि बन गये। भैरव भट्ट भी मुंशी जी के घर पर रहते थे। मुंशी प्रेम नारायण के घर पर रविवार को शाम के समय अक्सर चाय का दौर चलता था जहां भाभी विद्यावती चाय के साथ घर की बनी नमकीन व मठरी का नाश्ता कराती थी।

15 दिसंबर 1985 को मेरी शादी हुई तो मैंने मुंशी प्रेम नारायण को कार्ड दिया कि आपको जरूर आना है। मुंशी प्रेम नारायण साहूकारा अग्रवाल धर्मशाला में बारात आने से पहले ही पहुंच गये थे एवं  भोजन कर वहां से चले भी गये थे।  कुछ दिन बाद मैंने शिकायत की कि आप शादी में नहीं आये तो उन्होंने तपाक से कहा जब  तुम्हारी बारात रास्ते में थी तो हम लोग साहूकारा वाली धर्मशाला में पहुंच गये थे। सबसे पहले भोजन करने वालों में हम थे। जिसकी पुष्टि हमारे ससुराल पक्ष के लोगों ने भी कि एक मोटे से व्यक्ति आये थे और सबसे पहले खाना खाकर चले गये थे। कुछ अस्वस्थ होने पर मुंशी जी दिल्ली में अपनी बेटी के पास रहने लगे थे। मुझे फोन नंबर दे गये थे कि जब भी तुम दिल्ली आओ तो मेरी बेटी के देवनगर, दिल्ली स्थित आवास पर पत्नी को लेकर जरूर आना। मैं पत्नी को लेकर उनके देवनगर दिल्ली वाले घर पर भी गया। जहां उन्होंने मुझे बगैर भोजन के नहीं आने दिया। मुंशी प्रेम नारायण की शिक्षा इलाहाबाद में हुई जहां उन्होंने कानून की डिग्री ली। उनके पिता मुंशी लेखराज भी उर्दू संस्कृत के विद्वान थे। साथ ही वकालत भी करते थे।इसी कारण प्रेम नारायण ने वकालत शुरू कर दी। मस्तमौला स्वभाव एवं पत्रकारिता में रूचि होने के कारण कचहरी रोज जाया करते थे और मुकदमें उन पर सीमित ही आया करते थे। उ.प्र. सरकार में मंत्री रहे राम सिंह खन्ना के वे बहुत प्रिय थे। एक बार राम सिंह खन्ना के चुनाव के दौरान किसी ने उन्हें शराब का न्यौता दिया तो वह तपाक से बोले हम इतनी पी चु…

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