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युवा संकल्प सेवा समिति ने डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की 131 वीं जयंती हर्षोल्लास के साथ मनाई

April 14, 2022By sharad kumar0 comments
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बदायूं।आज युवा संकल्प सेवा समिति के तत्वधान में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर 131 वीं जयंती बहुत हर्षोल्लास के साथ मनाई।संस्था के प्रबंधक पुनीत कुमार कश्यप एडवोकेट संस्था के सदस्यों ने डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जीके चित्र पर माल्यार्पण पुष्प अर्पित किए और विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता संस्था के उपाध्यक्ष योगेश पटेल ने की व संचालन संस्था के कोषाध्यक्ष योगेंद्र सागर ने किया।संस्था के प्रबंधक पुनीत कुमार कश्यप ने कहा कि डॉ भीम राव अम्बेडकर स्वतंत्र भारत के सामाज सुधारक थे, उन्होंने भारत में सामाजिक असमानता, जाति व्यवस्था को पूर्ण रुप से समाप्त करने में योगदान दिया। वो स्वतंत्र भारत संविधान के निर्माता भी बने। वे कानून, राजनीति और अर्थशास्त्र सहित कई क्षेत्रों में उत्कृष्ट थे। वो भारत गणराज्य के प्रमुख नेताओं और वास्तुकारों में से एक थे। अम्बेडकर जी का जन्म मध्यप्रदेश के सेना छावनी क्षेत्र में हुआ था। उस समय उनके पिता भारतीय सेना में एक कर्मचारी थे।कोषाध्यक्ष योगेंद्र सागर ने कहा किभीमराव संस्कृत पढ़ना चाहते थे, किन्तु अछूत होने के कारण उन्हें संस्कृत पढ़ने का अधिकारी नहीं समझा गया । प्रारम्भिक शिक्षा में उन्हें बहुत अधिक अपमानित होना पड़ा । अध्यापक उनके किताब, कॉपी को नहीं छूते थे । जिस स्थान पर अन्य लड़के पानी पीते थे, वे उस स्थान पर नहीं जा सकते थे । कई बार उन्हें प्यासा ही रहना पड़ता था । इस प्रकार की छुआछूत की भावना से वे काफी दुखी रहा करते थे । एक बार तो भीम तथा उनके दोनों भाइयों को बैलगाड़ी वाले ने उनकी जाति जानते ही नीचे धकेल दिया । ऐसे ही मकान की छत के नीचे बारिश से बचने के लिए वे खड़े थे, तो मकान मालिक ने उनकी जाति जानते ही कीचड़ सने पानी में उन्हें धकेल दिया । अछूत होने के कारण नाई भी उनके बाल नहीं काटता था । अध्यापक उन्हें पढ़ाते नहीं थे ।पिता की मृत्यु के बाद बालक भीम ने अपनी पढ़ाई पूर्ण की । वे एक प्रतिभाशाली छात्र थे । अत: बड़ौदा के महाराज ने उन्हें 25 रुपये मासिक छात्रवृत्ति भी दी संस्था सदस्य विशाल वैश्य ने कहा कि डॉ० भीमराव अम्बेडकर आधुनिक भारत के प्रमुख विधि वेत्ता, समाजसुधारक थे । सामाजिक भेदभाव व विषमता का पग-पग पर सामना करते हुए अन्त तक वे झुके नहीं । अपने अध्ययन, परिश्रम के बल पर उन्होंने अछूतों को नया जीवन व सम्मान दिया । उन्हें भारत का आधुनिक मनु भी कहां जाता है । उन्होंने अपने अन्तिम सम्बोधन में पूना पैक्ट के बाद गांधीजी से यह कहा था- ”मैं दुर्भाग्य से हिन्दू अछूत होकर जन्मा हूं, किन्तु मैं हिन्दू होकर नहीं मरूंगा ।” तभी तो 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर के विशाल मैदान में अपने 2 लाख अनुयायियों के साथ उन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया।

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