सरकार की मार से युवा लाचार!

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गाजियाबाद ।अभी कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पुलिस के द्वारा छात्रों पर लाठी चार्ज किया गया, जिसको बिल्कुल भी न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता है। क्योंकि शांन्तिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार देश के नागरिकों को संविधान द्वारा प्रदान किया गया है। वैसे भी प्रदेश में छात्रों की नौकरियों में नियुक्ति समय पर नहीं है। सरकार पर लगातार कुछ ना कुछ अनियमितता बरतने और आरक्षण में धांधली के आरोप लग रहे हैं, स्थिति का निष्पक्ष आंकलन पर लगता है कि आखिरकार कुछ तो बात जरूर होगी। ऐसी परिस्थितियों में छात्रों का शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन करना जायज है, उनका संवैधानिक अधिकार है। वैसे भी बीजेपी पर अक्सर आरोप लगते रहें हैं कि वह कभी छात्रों या गरीबों के हित में काम नहीं करती। यदा कदा कभी कभार भले ही योजनायें हो या चुनाव में जरूर युवाओं को मुख्य केंद्र में रखा जाता है। 2014 का लोकसभा चुनाव हो या 2017 का यूपी चुनाव बेरोजारी मंहगाई और युवाओं को केंद्र में रखकर बीजेपी नें चुनाव लड़ा था। हालांकि केंद्र व प्रदेश में सरकार बनने के बाद कभी कभार ही युवाओं की सुधी सरकार के द्वारा ली गयी, यह तो महज एक बानगी भर है। 69000 शिक्षक भर्ती लगातार सवालों के घेरे में रही है, सरकार भले ही युवाओं पर फोकस करने का दिखावा करती है, लेकिन कभी भी युवाओं को मुख्यधारा में महत्व नही देती है। सिवाय मंत्री या व्यापारियों के बड़े घराने के युवाओं को ही विशेष महत्व दिया जाता है। पिछडे वर्ग के छात्रों का आरोप है कि 69000 शिक्षक मामले में आरक्षण को लेकर घोटाला हुआ है। कम से कम 6000 पदों पर छात्रों ने अनियमितता का आरोप लगाया है। इसके अतिरिक्त यूपी सरकार पर जातिवादी होने का भी आरोप लगता आ रहा। इस अनियमितता के विरोध में जब छात्रों नें कैंडल मार्च निकाला तो पुलिस नें जमकर लाठी चार्ज किया।

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पुलिस के लाठी चार्ज की वजह से कई छात्र घायल हो गये और कई लोगों को गंभीर चोट भी आयी। कई ऐसे वीडियों वायरल हो रहें हैं, जिसमें पुलिस के लाठी चार्ज से कई छात्र गंभीर रूप से घायल हो गये। पुलिस का व्यवहार शांतिपूर्ण ढंग से मार्च कर रहे छात्रों के साथ बेहद शर्मनाक था। छात्रों को अगर कोई समस्या है तो सरकार को समस्या का निदान करने के लिए छात्रों से बात करनी चाहिये न कि अपराधी की तरह व्यवहार करना चाहिये। लोकतंत्र की गरिमा यही है कि सरकार से आम नागरिकों का कोई मतभेद हो तो शांतिपूर्ण तरीकों से अपनी बात सरकार तक पहुँचा सकें। यूपी में अब तक कई महत्वपूर्ण परिक्षाओं के पेपर होने से पहले ही लीक गये हैं। यह यूपी सरकार की परीक्षा की गोपनीयता की नीति पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। सरकार सवालों के घेरे में है कि यह कैसी परीक्षा नीति है, भ्रष्टाचार के चलते पेपर आउट हो जा रहें हैं। यह सरासर छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। एक तरफ सरकार पेपर आउट होने से रोक नहीं पा रही तो दूसरी तरफ अपनी गलती छिपानें के लिये छात्रों पर लाठी चला रही है। छात्रों पर पड़ने वाली हर लाठी बस यही कह रही थी, की युवाओं को सरकार से अब उम्मीद छोड़ देनी चाहिये। यह सरकार धरातल पर कार्य करने की जगह सिर्फ प्रचार नीति पर विश्वास रखती है। कुछ दिन पहले यह भी कहा गया था कि 2 करोड़ लोंगो को इस सरकार में रोजगार दिये गये। क्या सरकार के पास ऐसा कोई डाटा है, अगर है तो उन दो करोड लोंगो का नाम सार्वजनिक करना चाहिये, जिससे की देश का आम नागरिक भी जान सके ऐसे कौन से 2 करोड़ अभ्यर्थी हैं जिनका चयन किया गया है। देश व समाज हित में यह जरूरी है कि कभी भी सरकार में बैठे लोगों द्वारा कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिये कि जुमला साबित हो जाय। इससे सरकार की साख पर सवाल खड़ा होता है। हालांकि राजनीति में अब साख पर ध्यान देश के नेता देना बिल्कूल छोड़ चुके हैं।
यूपी में विकास की राजनीति भी काफी पिछड़ गयी। नीति आयोग का डाटा भी यूपी को गरीब कह रहा हैं। उत्तर प्रदेश सरकार भले ही संरचनात्मक बदलाव पर ध्यान दे रही है। कोरोना काल में सरकार नें लोगों की मदद करने का प्रयास किया। परन्तु व्यवस्था की अव्यवस्था विकास कार्यों पर भारी पड़ रहा है। हालांकि गंगा सफाई योजना भी इसी प्रकार करोड़ो खर्च करके खटाईं में चली गयी। देश को जब सबसे ज्यादा आवश्यकता है कि गरीबी बेरोजगारी मँहगाई पर लगाम लगे। ऐसे में सरकार के सारे प्रयास विफल साबित हो रहे है। सरकार में बैठे लोंगों के पास अब भी समय है कि नीतिगत फैसलों और जनहित के फैसलों पर सोचसमझ कर विचार किया जाय। क्योंकि बेरोजगारी मंहगाई इसी तरह बढ़ती रही तो संभव है कि खाली जेब ओमिक्रान की आने वाली लहर हम पर भारी पड़ेगी, वैसे भी अगर सरकार समय पर सचेत न हुई तो यह स्थिति आगामी चुनावों में सत्ता पक्ष पर भारी पड़ने की पूरी संभावना है।

बृजेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार
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