बदायूँ। खादी ग्रामोद्योग कार्यालय बदायूँ में रिश्वत मांगने के आरोप से जुड़े 14 वर्ष पुराने मामले में अदालत ने अभियुक्त नरेंद्र को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष भ्रष्टाचार के आरोपों को युक्तियुक्त संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। मामला वर्ष 2014 का है। वादी विनोद कुमार ने आरोप लगाया था कि लोन की फाइल पास कराने के लिए खादी ग्रामोद्योग कार्यालय के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी नरेंद्र ने 10 प्रतिशत रिश्वत की मांग की थी। शिकायत के आधार पर थाना सिविल लाइन, बदायूँ में एफआईआर दर्ज की गई। विवेचना पूरी होने के बाद पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल किया और वीडियो रिकॉर्डिंग की सीडी को इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में अदालत में पेश किया। मुकदमे की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से 10 गवाहों के साथ एक कथित चश्मदीद गवाह भी पेश किया गया। हालांकि, जिरह के दौरान गवाहों के बयानों में कई विरोधाभास सामने आए। वहीं इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की सील, मोबाइल और सिम जब्त न किए जाने, आवश्यक प्रमाणपत्र प्राप्त न करने तथा आरोपी की शिनाख्त न कराने से जुड़े सवालों पर विवेचकों की ओर से संतोषजनक जवाब नहीं दिए जा सके। अंतिम बहस के दौरान बचाव पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता शंकर कुमार सक्सेना और सहायक अधिवक्ता सुमित मुनि सक्सेना ने अदालत के समक्ष तर्क रखा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत रिश्वत की मांग और उसकी स्वीकार्यता को अभियोजन पक्ष द्वारा विधि सम्मत एवं ठोस साक्ष्यों से साबित किया जाना आवश्यक है। बचाव पक्ष ने इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का भी हवाला दिया। अदालत ने मामले की विवेचना में सामने आई कमियों और अभियोजन साक्ष्यों की कमजोरियों को ध्यान में रखते हुए अभियुक्त नरेंद्र को रिश्वत के आरोप से बरी कर दिया।