बदायूं। समाजवादी पार्टी के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। पार्टी के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं का आरोप है कि चुनावों और संगठन में मुस्लिम समाज को अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है। उनका कहना है कि पीडीए का नारा व्यवहार में पूरी तरह दिखाई नहीं देता और अहम पदों तथा टिकट वितरण के समय मुस्लिम नेताओं की अनदेखी की जाती है।इसी क्रम में बदायूं जनपद के ग्राम शेखूपुर निवासी अब्दुल बासित फरीदी (वासू) ने पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि परिवारवाद की राजनीति से ऊपर उठकर सभी वर्गों को उचित भागीदारी दी जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी की सरकार बनने में मुस्लिम समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, लेकिन पदों और टिकट वितरण के समय उन्हें “दूध में से मक्खी की तरह निकालकर अलग कर दिया जाता है।”उन्होंने कहा कि पार्टी नेतृत्व को वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पीडीए की अवधारणा को सही मायनों में लागू करना चाहिए,अन्यथा भविष्य में पार्टी को इसका राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।अब्दुल बासित फरीदी ने यह भी सवाल उठाया कि बदायूं जिले में पार्टी संगठन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों, विशेषकर जिला अध्यक्ष जैसेपदों पर मुस्लिम समाज को प्रतिनिधित्व क्यों नहीं दिया जा रहा है। हालांकि, इस संबंध में समाजवादी पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आगामी विधानसभा चुनावों से पहले संगठनात्मक प्रतिनिधित्व और टिकट वितरण को लेकर ऐसे मुद्दे पार्टी के भीतर चर्चा का विषय बने रह सकते हैं।